दाग नहीं जाते
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बात कुछ समय पूर्व की है.. एक दिन अचानक ध्यान गया कि बाथरूम के नल से बूंद बूंद पानी टपक रहा है। मैंने सहज ही कुछ घरेलू उपचारो का सहारा लिया। नल को थोडा कसने का प्रयत्न किया, रस्सी के टुकडो से बांधने का प्रयत्न किया पर कुछ बन ना पा या, पानी इसी तरह टपकता रहा। अब जब जब बाथरूम जाती बरबस उस टपकते पानी की ओर ध्यान जाता फिर बाहर आने के बाद बात आई, गई हो जाती। मन ही मन प्लंबर को बुलाने का निश्चय होता। फिर काम में बूंद बूंद पानी की बात भूल जाती। प्लंबर को बुलाना रह जाता। समस्या भी बूंद बूंद ही लगी। इस तरह दिन तो कट जाता पर रात को इस बूंद बूंद पानी टपकने की आवाज बेचैन कर देती।
सुनसान, अंधियारी रात के सन्नाटे में बूंद बूंद पानी टपकने की आवाज बेचैन कर देती। जब नींद नही आती तो पुनः संकल्प होता, कल कुछ भी हो प्लंबर को बुलाना ही है। और आखिर प्लंबर को फोन किया। अब प्लंबर याने नल का डॉक्टर की बिमारी, उसके लक्षण, फिर कौन सी दवा दी जाय आदि आदि।अब यदि डाक्टर साहब है तो जल्दी तो नहीं आएंगे। दो तीन बार फोन किया तब कहीं डाक्टर साहब आए, मरीज को देखा, नाडी देखी, इलाज किया।इलाज का जल्दी ही असर दिखा। रोग ठीक हो गया। डाक्टर साहब को फीस के पैसे दिए और फीस देते देते एक प्रश्न पूछ लिया, बाथरूम में ये दाग पड गये हैं। बहुत घिसा पर दाग छूटते ही नहीं, कैसे छूटेंगे ये दाग ?उसने बडे आत्म विश्वास से कहा -आंटी जी अब ये दाग नहीं छूटेंगे।
पानी के दाग नहीं छूटते। नहीं जाते ये दाग। पर उन डाक्टर की बात पर बिल्कुल विश्वास नही हुआ, और जब जब , जहां जहां इन दागों को छुडाने के जो जो नुस्खे मिले सब आजमाये कभी लगता हां दाग छूट गये पर यह कोरा भ्रम था ।वे यथावत ही रहे। ।सच में दाग छूटे ही नहीं।लगा, जिस पानी से न जाने कौन कौन से दाग छूट जाते है, उस पानी के ही दाग आखिर क्यों नही छूटते? अचानक अपने बचपन में स्कूल के दिनों में पढा एक दोहा याद आया.. पानी गये न उबरे, मोती मानुस चून- अर्थात मोती से पानी उतर जाय तो उसकी चमक जाती रहती है,,मनुष्य का पानी याने इज्जत उतर जाय तो समाज की नजरों से वह उतर जाता है, चूने का पानी सूख जाय तो चूना भी काम का नहीं रहता।
अब लगा इसमें एक और जोड़ दिया जाय,नल से पानी बहता जाय ,छूटता जाय तो दाग नहीं छूटते ।
जब जब बाथरूम में जाती दाग देख पंक्तियां याद आती । महसूस हुआ, इतने दिनों में बूंद बूंद कर न जाने कितना पानी बह गया होगा ,इसका खेद भी हुआ।अब जाते जाते यह ऐसा पाठ पढा गया कि जीवन भर याद रहे ।
साथ साथ बचपन में घर के बडे बूढों से सुनी यह बात भी याद आती रही ,”वे कहते, नल ठीक से बंद करो।जिस तरह नल से बूंद बूंद पानी टपक कर नष्ट होता है, वैसे ही घर का धन भी थोडा थोडा कर नष्ट होता है ।
अब लगने लगा बूंद बूंद पानी के नष्ट होने के साथ संपत्ति के नष्ट होने की बात जोडकर उन्होंने पानी की महत्ता सिद्ध की ।वास्तव में संपत्ति नष्ट ना भी हो ,पर पानी का बूंद बूंद कर नष्ट होना ही क्या संपति का नष्ट होना नही,?पानी के बिना जीवन की कल्पना भी कैसे की जा सकती है?
जल ही तो जीवन है! जल से ही जीवन, जल बनाएं रखे। जल जो गया, तो जला दिए जाओगे, मुट्ठीभर राख हो जाओगे, जल में विसर्जित हो जाओगे, जल से एकाकार हो जाओगे। जल बन बहते जाओगे। फिर जल हो जाओगे।
तात्पर्य यही कि जल के बिना हमारा जीवन असंभव है। शरीर से जल गया तो हम गये ।पर वास्तव में जबतक बडी सहजता से हमें जल मिलता रहता है हमें उसकी कीमत समझती ही नहीं। इसका अनुभव तो तब होता है जब पानी की किल्लत होती है।व्यक्ति बूंद बूंद पानी को तरसता है, पानी के लिए झगढता है,लडता है, और कभी कभी दम भी तोड देता है।
तो पानी की एक एक बूंद का हमारे जीवन में कितना मूल्य है, यदि हम उसे नष्ट होने देते हैं, तो बिना बोले ही वह हमें ऐसा पाठ पढा जाता है, ऐसे दाग छोड जाता है कि आजीवन भूल न सकें ।
- प्रभा मेहता
नागपुर, महाराष्ट्र
9423066820
