नागपुर। भारतीय भाषाओं की प्रकृति लगभग एक समान है। उनमें अर्थ की दृष्टि से पर्याप्त समानता है। प्रयोग के स्तर पर कुछ भिन्नता है लेकिन क्षेत्रीय अस्मिताओं को ध्यान में रखते हुए उनकी शाब्दिक समानता को समझने की जरूरत है। यह बात भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली के सलाहकार प्रो. सर्राजू ने हिंदी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय एवं भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के समापन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की अतःसूत्रता को समझने के लिए भाषाओं के बीच की समानता को समझना होगा। हमारी भाषाओं में वैविध्य के बावजूद पर्याप्त समानता है। क्योंकि सांस्कृतिक दृष्टि से यह राष्ट्र एक है। भाषाएं सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्र को जोड़ने का भी माध्यम रही हैं। प्रो. सर्राजू ने भारतीय भाषाओं के समान शब्दों के संग्रह और निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
प्रमुख अतिथि डॉ वंदना खुशलानी ने अपने उद्बोधन में हिंदी - मराठी की समान प्रकृति की चर्चा करते हुए कहा कि भाषाएं सामाजिक अनुबंध का माध्यम हैं। उनके जरिए ही समाज के विविध क्रियाकलाप सम्पन्न होते हैं, मानवीय अंतर्संबंध मजबूत होते हैं। विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए अजय पाठक ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय तभी स्थापित होगा जब समान शब्दों का व्यवहार बढ़ेगा। संयोजक डॉ. मनोज पाण्डेय ने संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के समान शब्द ही राष्ट्रीय एकीकरण के आधार हैं। शब्द ही राष्ट्र को, समाज को जोड़ने के माध्यम हैं। भाषाएं संरक्षित होंगी तो जीवन सुरक्षित होगा, संबंध सुदृढ़ होंगे और भाईचारा बढ़ेगा।
इस अवसर पर भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से राष्ट्र शिल्पी सरदार वल्लभभाई पटेल की १५०वीं जयंती के निमित्त प्रकाशित पुस्तक का विमोचन अतिथियों ने किया। पुस्तक का संपादन डॉ. मनोज पाण्डेय ने किया है। दो-दिवसीय कार्यशाला में हिन्दी -मराठी की समान शब्दावली पर उत्साहवर्धक और उपयोगी चर्चा हुई। इस अवसर आयोजित काव्य गोष्ठी में डॉ. लोकेंद्र सिंह, अविनाश बागड़े, अनिल मालोकर, नीरज श्रीवास्तव, वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के महानिदेशक नरेंद्र कुमार, सत्येंद्र प्रसाद सिंह, शशिकांत शर्मा सहित अनेक कवियों ने काव्य पाठ किया। कार्यशाला में डॉ. प्रकाश कोपार्डे, हैदराबाद, डॉ. दिनेश पाठक,मुंबई, डॉ. संदीप सपकाल, वर्धा, डॉ. विजय कलमधार,छिंदवाड़ा, डॉ.सुनील व्यवहारे, किनवट, डॉ राहुल म्हैसकर,पुणे, डॉ. भूषण भावे, गोवा, डॉ. महेंद्र ठाकुरदास, पुणे, डॉ.सपना तिवारी, डॉ. अमृता इंदुरकर, डॉ. विनय कुमार उपाध्याय, डॉ. कल्याणी कॉळे सहित हिन्दी, मराठी और संस्कृत के ४० विषय विशेषज्ञ उपस्थित थे।

