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ग़ज़ल :

वो जानता है के अनजान सा नहीं होता बस एक मेरा ही कोई  पता नहीं होता ये कैसा कर्ज़ है मुझ पे तेरी मोहब्बत का किया है मैं ने अदा पर अदा नहीं हो...

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ग़ज़ल

चाहत से किसी को तेरी इंकार नहीं है  हर दिल में मगर जुरअत-ए- इज़हार नहीं है  सहरा का सफ़र काट के लौटा तो ये देखा  शहरों में भी अब साया-ए-दीवा...

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