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बिटियाँ ससुराल की राह चली

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माँ का देखो फटा कलेजा  पिता की आंखें झर झर बही   आंगन में अपनी यादों को छोड़  बिटियाँ ससुराल की राह चली।  छोटी सी नन्ही कली।  दुल्हन बन ससुराल चली।   रोज झगड़ती लड़ती सखियां  कोने में चुप चुप है खड़ी  देख पड़ोसन काकी भाभी  के आंखों में आंसू की झड़ी  बिटियाँ ससुराल की राह चली। छोटी सी.. दुल्हन बन.. दिनभर लड़की झगड़ती भाई से   करती शिकायत खूब खरी आज भाई की बाहे थामें  गले मिलकर वह फूट पड़ी  बिटियाँ ससुराल की राह चली। छोटी सी.. दुल्हन बन..  दादा दादी की आंँखों में दिखता भोलापन है  बिटियाँ के जाने का उनके मन में गम है  पलकों में आंसू छुपा दे रहे दुआएं  पोती को डोली में बिठा यादों को गले लगाए।  बिटियाँ ससुराल की राह चली।  छोटी सी.. दुल्हन बन.. गाय से खूंटी बंधी हुई थी देख-2 रंभाए रही थी  चारा कौन खिलाए मुझको  बिटियाँ तू ससुराल चली  बिटियाँ ससुराल की राह चली।  छोटी सी.. दुल्हन बन.. पिंजरे का मिट्ठू भी सहम दुबक कर बैठा  ...

एक पल के लिए सोचो

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एक पल के लिए सोचो, जरा रुक जाओ ठहर जाओ,  पलके मूंद लो, और इक पल के लिए सोच लो, आज से आप सिर्फ सच बोलोगे  और सच के सिवा कुछ भी नहीं। देखो आपकी पूरी ज़िंदगी ही पुरी तरह से बदल जाएगी एक पल के लिए सोचो की सारे लोग ईमानदार हो जाए सिर्फ सच ही बोले झूठ से नाता तोड ले  चोरी करना छोड़ दे तो सारी दुनिया  कितनी खुश हो जाएगी? जरा सोचो नेता गण  क्या बोलेंगे और  कितना बोल पाएंगे? विधानसभा में मौन रहेगा लोकसभा में स्पीकर भी मौन रहेगा, क्या होगा क्या कर पाएंगे? जरा सोचो अदालत में वकील क्या करेंगे हो सकता है की  अदालते बंद ही होके रहेंगी। डॉक्टर भी क्या बता पाएंगे, कि असल में आप सेहतमंद है। तुम सब से हसीन  सबसे ज्यादा खुबसूरत हो ऐसे संवाद शायद  फिर कभी सुनाई नही देंगे तारीफों का पुल बनने के  पहले बिखर जायेगा एक पल के लिए ही  मिलने वाला  झूठा ही सही सुख भी नहीं  मिलेगा शादियों में बहुत  गड़बड़ हो सकती है पहली रात जब पता पड़ेगा की ये तो पहली है ही नहीं, अनेकों में की आज की पहली है तो सार...

जीवन के मकड़जाल से कैसे निकलें

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फरेबियों के जाल से सतर्क  होकर चलना चाहिए,  जो दिन को रात और रात को दिन कहें  ऐसे चापलूसों से बचकर निकलना चाहिए। जिसके दिखावे के दांत और खाने के हों अलग -अलग, ऐसे मूर्खो के मुंह नहीं लगना चाहिए। चमक शीशे के टुकड़े भी चुरा लेते हैं हीरे की, परख कर ही ऐसे रत्नों को ख़रीदना चाहिए। बहस करने का दामन जिसका रहता हो खुला , उस शख्स से हरदम दूर रहना चाहिए। बात बात में उग्र होजाता हो पारा जिसका ,  *मिश्र* रोगी के ऐसे  निदानों पर काम करना चाहिए । जब कोई इंसा आपकी शराफ़त का ग़लत अर्थ निकालने लगे, आपकी मौजूदगी बर्दाश्त नहीं है उसे तब ये समझ जाना चाहिए।  - रामनारायण मिश्र    नागपुर, महाराष्ट्र