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मोको कहाँ ढूँढे…

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लेखिका : प्रभा मेहता, नागपुर जैसे-जैसे अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें मद्धिम पड़ने लगती हैं, आकाश में लालिमा छाने लगती है, अपने घोंसलों की ओर लौटते पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगता है और दूर कहीं शीतल चंद्रकिरणें आकाश में झाँकने लगती हैं, वैसे-वैसे दिनभर घर की चारदीवारी में कैद बुजुर्ग मन भी खुली हवा में साँस लेने के लिए मचल उठता है। आखिर क्यों न मचले? घर की चारदीवारी के भीतर मन को लुभाने वाला है ही क्या? आज की फ्लैट संस्कृति में सबके दरवाजे बंद हैं। न कोई किसी के घर जाता है, न कोई किसी के घर आता है। न सुख-दुःख बाँटने का अवसर है, न आपसी बातचीत का। हर व्यक्ति अपनी दुनिया में सिमटा हुआ है। ऐसे में दिनभर साथ निभाता है तो केवल टेलीविजन का वह डिब्बा, जो सुबह सुने और अखबारों में पढ़े समाचारों को ही थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ बार-बार दोहराता रहता है। समाचारों से मन ऊब जाए तो विभिन्न चैनलों पर बहस, आरोप-प्रत्यारोप और तू-तू, मैं-मैं का सिलसिला शुरू हो जाता है। चैनल बदलते-बदलते समय गुजरता रहता है और देखते ही देखते सुबह से शाम हो जाती है। फिर खुली हवा, नीला आकाश और चमकते सितारे मन को अपनी ओर आकर...

दीप पर्व दीपावली

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  अपनी सभ्यता और संस्कृति पर है हमें गर्व  आओ,फ़िर मनायें खुशियों की दीपावली उमंगों का दीप पर्व  हर घर में रंगों का चमकता उजाला हो  हर चेहरे पर मुस्कान और  स्वादिष्ट निवाला हो अमावस की रात में, आशा के दीप जलाएं, प्रेम, सद्भाव और खुशियों से, हर आंगन महकाएं। मिटे अंधेरा मन का सारा, द्वेष का हर बंधन टूटे, मानवता की ज्योति जले, अपनों से हर रिश्ता जुड़े। दीप जलें विश्वास के, दीप जलें उल्लास के, दीप जलें इंसानियत के, दीप जलें नवप्रकाश के! यह दिवाली : खुशियों वाली ! - सत्येंद्र प्रसाद सिंह, नागपुर      9422803922

किस के साथ?

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जब खुद को एहसास होता हैं की खुद की कोई हैसियत नहीं तब बहुत सारे लोग इस विषय मे कुछ न कुछ करने का सोचते हैं आज के समय में आज की जगह में आज कुछ ज्यादा  कर तो सकते नहीं लेकिन जल्दी बड़ा बनने की छुपी ख्वाइश तो रहती है। आज के जल्दी जल्दी वाले, जिंदगी में लोग फिलहाल मे, किसी बड़े को ढूंढते हैं उस के साथ पहचान बढ़ाते हैं, उसके साथ छबि या सेल्फी निकालते है, उसको अपने दोस्तों में चलाते हैं, झूठी शान दिखाते हैं  अपना रौब जमाते है, उन के दोस्त भी ज्यादातर उन्हीं की क्लास के होते हैं वे सब बिना भूले  "वाव अमेजिंग" बोलते हैं। आज के ज़माने में  एक तरह के खोखले, अर्थहीन बड़प्पन की तलाश रहती हैं इक सनक रहती की  किसी भी तरह से बड़े बने अगर इस तरह से बड़े बन भी  गए तो बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं और उस की शून्यता  जल्दी ही समझ में आती है। ठहराव  गहराई  संयम  नम्रता  अभ्यास, समझते समझते जिंदगी गुजर जाती हैं किसी गुजरे सावन के भांति। जिंदगी के अंत में अपने हाथ में एक खाली कटोरा नजर आता हैं आप को बड़ा बनने के...