मोको कहाँ ढूँढे…
लेखिका : प्रभा मेहता, नागपुर जैसे-जैसे अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें मद्धिम पड़ने लगती हैं, आकाश में लालिमा छाने लगती है, अपने घोंसलों की ओर लौटते पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगता है और दूर कहीं शीतल चंद्रकिरणें आकाश में झाँकने लगती हैं, वैसे-वैसे दिनभर घर की चारदीवारी में कैद बुजुर्ग मन भी खुली हवा में साँस लेने के लिए मचल उठता है। आखिर क्यों न मचले? घर की चारदीवारी के भीतर मन को लुभाने वाला है ही क्या? आज की फ्लैट संस्कृति में सबके दरवाजे बंद हैं। न कोई किसी के घर जाता है, न कोई किसी के घर आता है। न सुख-दुःख बाँटने का अवसर है, न आपसी बातचीत का। हर व्यक्ति अपनी दुनिया में सिमटा हुआ है। ऐसे में दिनभर साथ निभाता है तो केवल टेलीविजन का वह डिब्बा, जो सुबह सुने और अखबारों में पढ़े समाचारों को ही थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ बार-बार दोहराता रहता है। समाचारों से मन ऊब जाए तो विभिन्न चैनलों पर बहस, आरोप-प्रत्यारोप और तू-तू, मैं-मैं का सिलसिला शुरू हो जाता है। चैनल बदलते-बदलते समय गुजरता रहता है और देखते ही देखते सुबह से शाम हो जाती है। फिर खुली हवा, नीला आकाश और चमकते सितारे मन को अपनी ओर आकर...