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एक पल की कीमत

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पल पल जीते जीते कभी कभी जीवन की लंबी राह में लोग इक पल के लिए  अचानक गम्भीर हो जाते मजबूर होकर अपने बारे में सोचते         ठिठक के खड़े हो जाते  उस थमे से इक छोटे से पल में किसी को जिंदगी समझती है तो किसी की जिंदगी बिखरती हैं वैसे देखा जाए तो पल आता है किसी आकलन के पहले चला जाता हैं पल कभी बारात के साथ बैंड गाजे साथ आता है तो कभी पतली गली से चुप चाप निकल लेता है पल किसी के लिए  अलग अलग से नहीं आता राजा के लिए खास  और गरीब के लिए आम नहीं आता ये बात समझने में  हमारे नेताओं को सालों लग गये ये एक पल में भगवान के भी सामने वीआयपी बन गये। एक एक पल की कीमत अपनी अपनी तरह से समझ में आती हैं किसी के साथ एक पल एक युग के समान तो किसी और के साथ वही युग एक पल के समान बदलते हम  ही हैं हमारी सोच भी बदलती हैं किसी अपने ने अपने के एक हां के लिए एक पल अपने तरफ आस भरी  नजरों से देख कर बड़े बेमन से राह पकड़ ली थी उस एक पल की देर ने अपनी पुरी जिंदगी की रफ्तार को रोक के रखा हैं  रुकी रुक...

ख़ुद के घर में ये अजनबी कौन ?

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              मैंने स्वयं से पूंछा- अपने ही घर में ये अजनबी है कौन ? अंदर  से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली। केवल दीवारों ने चुपचाप कहा घर का होना और अपना होना दोनों  में  बहुत फर्क है । मैंने फिर स्वयं से ही पूंछा  ये अधूरे ख़्वाब तब भला किसके थे?जो मैंने बड़े  उत्साह से बुनें थे या फिर  मेरे उन नयनों के, जिन्होंने मुझे मेरे होने से पहले ही मेरे  वजूद को परिभाषित कर दिया था? साँसें भी कभी अपनी होती हैं? हर श्वास तो समय से उधार ली गयी  चेतना है , फिर किस अधिकार से मैं जीवन को अपना  मानता  रहा? मैंने झरोखे  से बाहर देखा बाहर क्षितिज साफ़ था हां! दूर कहीं दूर बादलों का झूंड  अठखेलियां करते हुए ज़रूर नज़र आ रहा था। न कोई घर, न कोई छत। तब समझा, सीमाएँ बाहर कम,और हमारे  भीतर ही अधिक होती हैं। मैंने अंतिम बार फ़िर स्वयं से पूंछा क्या सितारों पर सचमुच में किसी का कोई अधिकार  है? इस बार भी भीतर से  ख़ामोशी ही मिली कोई उत्तर नहीं मिला। मैं ...