।।गहन चिंतन।। स्वधर्म परधर्म!
क्या किसी एक को पसंद करने के लिये बाकी सबको नापसंद करना एक जरूरी शर्त होती है? यह सवाल जेहन में इसलिये उठता है, क्योंकि देखा जाता है कि एक धर्म व सम्प्रदाय को पसंद करने वाले और मानने वाले लोग आमतौर पर अपने धर्म की श्रेष्ठता व विशिष्टता साबित करने के लिये दूसरे धर्मों व सम्प्रदायों की खामियां गिनाते हुये उन्हें अपने धर्म व सम्प्रदाय की तुलना में हेय और हीन बताना जरूरी समझते हैं।
यह केवल सामान्य या आम आदमी तक ही सीमित नहीं है। बल्कि आम आदमी की भी अपेक्षा उस धर्म-सम्प्रदाय विशेष को नेतृत्व देने वाले आचार्यों में यह आग्रह (दुराग्रह?) ज्यादा गम्भीर रूप से पाया जाता है। यदि इन अर्थों में धार्मिक होने का अर्थ परधर्म के प्रति दुराग्रही होना है तो शायद धार्मिक न होना मानवहित में ज्यादा श्रेयस्कर होगा।
परधर्म के प्रति सम्मानपूर्ण उपेक्षा का भाव तो समझ में आता है। क्योंकि एक मार्ग पर चलने का चुनाव करने के उपरान्त दूसरे सभी मार्गों की उपेक्षा करनी ही होती है, अन्यथा चुने हुये मार्ग पर चलना सम्भव नहीं हो सकेगा। किन्तु इस उपेक्षा में पथिक के मन में दूसरे मार्गों के प्रति हेय भाव नहीं रहता।
बल्कि उस मार्ग का चुनाव करने वाले दूसरे पथिकों के प्रति भी उसके मन में स्वाभाविक ही सम्मानभाव रहता है। विभिन्न धर्मों के वास्तविक अनुयायियों में भी ऐसे भाव की उम्मीद की जानी चाहिये। अन्यथा यह माना जाना चाहिये कि सच्चे अर्थों में धर्ममार्ग पर यात्रा का आरम्भ हुआ ही नहीं।
- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)