फ़ुरसत मिले तो भी...
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नौकरी से रिटायर होते आदमी को सलाह दी गई कि रिटायर होने के बाद खुद को किसी शौक या दूसरे कामों में मसरूफ कर लेना चाहिए ताकि खाली वक्त के डिप्रेशन से बचाव हो सके। शौक या दूसरे काम के तौर पर संगीत, साहित्य, कला, सामाजिक काम या खेल इत्यादि के उदाहरण गिनाये गये।
लेकिन किसी ने भी आध्यात्मिक-साधना के अभ्यास को ऐसे किसी उदाहरण में शामिल करना कतई जरूरी नहीं समझा। यह लगभग हमेशा ही होता है। जिन्दगी में आध्यात्मिक रुझान होने तक तो ठीक है। कभी-कभार आध्यात्मिक किताबें पढ़ लेना या फिर किसी आध्यात्मिक रिट्रीट में पार्टिसिपेट कर लेने में भी कोई बुराई नहीं है।
पर आध्यात्मिक खोज को जीवन का लक्ष्य बना लेना लोगों को आमतौर पर बेहद अजीब लगता है। लगता है कि खुद को क्या खोजना? खुद यानि स्वयं तो जाना हुआ लगता ही है। यह तो टेकेन फाॅर ग्रांटेड जैसी चीज है। इसको जानने में जिन्दगी के बेशकीमती वक्त को क्या जाया करना? हां मेडिटेशन वगैरह करते हैं ताकि मन शान्त रहे और दुनिया के काम पूरी कुशलता व दक्षता से किये जा सकें। इसमें फुलटाइम जाॅब के तौर पर स्वयं की खोज का उद्देश्य रखना बेकार और पहुंच के बाहर की चीज लगती है।
रिटायर होने के बाद भी खुद को खाली रखने में घबराहट लगती है और डिप्रेसिव लगता है। खुद के अंदर झांकने की बात ही जैसे बेमानी और अर्थहीन लगती है। दस मिनट भी इस तरह से खाली रहकर खुद को रूबरू देखने का काम पड़े तो हम घबरा कर गैरजरूरी ही सही, पर कोई न कोई बाहरी काम ढूंढ़ कर खुद को बेतरह मसरूफ कर लेते हैं।
हालांकि हम जिन्दगी भर शिकायत करते हैं कि क्या करें खाली वक्त ही नहीं मिलता। मरने तक की फुरसत न होना लोगों के मुंह से हम अक्सर सुनते रहते हैं। लेकिन जब वही फुरसत मिल जाती है और खाली होकर खुद से मुखातिब होने का वक्त मिलता है तो हमें तुरंत बाहरी दुनियावी मसरूफियत की बेहद जरूरी दरकार हो जाती है।
हमारे लिये आध्यात्मिक सत्य से बढ़कर दुनिया की हर चीज जरूरी हो जाती है, भले ही उसको पाने में हमारी पूरी जिन्दगी ही क्यों न खर्च हो जाय और आखिर में भले ही कुछ भी काम का हासिल न हो। ऐसे तो हम हैं और ऐसी तो हमारी जिन्दगी है।
- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)