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रक़ीब


दुश्मन से जो  ख़ैरियत पूछी,
खुदा कसम, 
दोस्त हो गया।

बंदे ने ज़ुल्म ढाए बहुत मगर,
आज वो भी दिवाना हो गया।

कभी दिल के हजार टुकड़े किए थे उसने, 
आज दिल-ए-खास हो गया।

या अल्लाह, 
तुने खेल कैसे दिखाए
मैं मुल्हिद भी
दीनदार हो गया।

- डॉ. शिव नारायण आचार्य 'शिव'
नागपुर (महाराष्ट्र)
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रकीब - दुश्मन
मुल्हिद - नास्तिक
दीनदार - धार्मिक
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काव्य 1715281025178958133
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