निजी स्कूलों में बढ़ती फीस : अभिभावक हलाकान
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महाराष्ट्र नागपुर, एक समय था जब सरकारी स्कूल में पड़कर बड़े-बड़े डॉक्टर इंजीनियर साइंटिस्ट उच्च अधिकारी तक बच्चे बने हैं। क्योंकि उसे समय सरकारी स्कूलों की स्थिति इतनी अच्छी थी कि वहां पर पढ़ने वाले हर एक मास्टर भी बच्चों को पढ़ने में बहुत रूचि लेते थे। चाहे सरकारी स्कूलों में सुविधाओं का अभाव रहा हो परंतु उस समय भी बहुत ही होनहार बच्चे सरकारी स्कूलों से निकलकर ही बड़े-बड़े अधिकारी बने उच्च पदों पर भी आसीन रहे हैं।
सरकारी स्कूलों में कुछ अभावों को देखते हुए धीरे-धीरे निजी स्कूलों ने अपने पैर पसारना शुरू कर दिए और उन्होंने इतनी मजबूती से पकड़ के साथ पैर पसारे, उन सभी कमियों को पूरा करते हुए जो सरकारी स्कूलों में थी इस तरह लोगों का आकर्षण अपने निजी स्कूलों की तरफ करते चले गए। लोग भी बहुत सारी सुविधाएं पाकर निजी स्कूलों की तरफ आकर्षित होने लगे। दिन प्रतिदिन सरकारी स्कूलों से बच्चों की कमी होती चली गई और अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में करते चले गए। निजी स्कूलों में पहले तो सुविधा अधिक और स्कूल की फीस वगैरह बहुत कम थी सरकारी स्कूलों की कमियों को देखते हुए लोगों ने थोड़ी अधिक राशि देना अपने बच्चों के भविष्य के लिए सही समझा और वह निजी स्कूलों में सरकारी स्कूल से कुछ अधिक राशि देकर अपने बच्चों के भविष्य के हसीन सपने संजोने लगे।
परंतु जैसे ही निजी स्कूलों ने देखा कि अभिभावक अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिये अधिक से अधिक व्यय कर सकते हैं और निजी स्कूलों कि पकड़ बहुत मजबूत हो गयी तो धीरे-धीरे निजी स्कूलों ने अपनी मनमानी शुरु कर दी जैसे कि हर साल फीस में बढ़ोतरी, अलग-अलग चीजों कि अलग फीस जैसे परीक्षा शुल्क, दाखिला शुल्क, ट्यूशन शुल्क, वाहन शुल्क अन्य सभी जोड़ते हुए आज वर्तमान में एक माह कि फीस निजी स्कूलों में लगभग तीन हजार तक एक माह में लगा रहे। अगर पूरे साल भर कि फीस का हिसाब लगाएं तो लगभग केवल वाहन शुल्क व फीस का मूल्य ही सत्तर से पिच्चतर हजार रुपये हो जाता है। उसके अतिरिक्त साल भर के प्रोजेक्ट, स्कूल यूनिफार्म, व कॉपी किताब व अन्य छोटे-छोटे शुल्क ओर जोड़ दिए जाएं तो साल का एक लाख या उससे अधिक का बजट हो जाता है। ये जो आंकड़ा अंदाजन निजी स्कूलों का बताया है ये पांचवी कक्षा से आठवीं कक्षा तक का ही है। यदि इससे उच्च कक्षा कि ओर आंकलन लगाएंगे तो वो करीब डेढ़ लाख तक हो ही जाएगा।
अब तो निजी स्कूलों ने एक नियम निकाला है आपको विद्यालय कि गणवेश परिधान भी स्कूल से ही खरीदने हैं तो पुस्तक कॉपी-किताब फाइलें, कार्डबोर्ड वगैरह-वगैरह आपको स्कूल से ही लेना ही पड़ेगा। जब कि स्कूल में जो कीट बनाकर दी जाती है उसकी कीमत अन्य स्कूलों से दुगने भाव की होती है। जो चीज जरूरत कि भी नहीं वह भी किट के माध्यम से जबरदस्ती अभिभावकों को चिपका दी जाती है। अगर ये कहा जाए कि निजी स्कूल ठीक उस व्यवसायी की तरह हैं जिसमें पहले तो सामान कि कीमत बहुत कम रखी जाती ताकि ग्राहक अधिक से अधिक आकर्षित हों जब अच्छे खासे ग्राहक झांसें में फंस जाए तो कीमतें बढ़ा दो। अभिभावक जिन्होंने अपने बच्चे का कम लागत देखते हुए पहले तो दाखिला करवा दिया फिर वो तीन चार वर्ष तो बहुत खुश रहते परंतु जब महंगाई का पानी उनकी गर्दन तक आ जाता तो वो गर्दन भी नहीं हिला सकते क्योंकि बीच में बच्चे को किसी भी स्कूल से निकलवाकर अन्य स्कूलों में दाखिला दिलवाने से उसकी पढ़ाई में व्यवधान उत्पन्न होता है। बस मजबूरी है निजी स्कूलों कि मनमानी को झेलना अभिभावकों के लिये।
- वीना आडवानी ‘तन्वी’
नागपुर, महाराष्ट्र
