दिव्यांगों को सहानुभूति नहीं, अवसर दें : दीक्षा दिंडे
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नागपुर/हिंगणा। 'दिव्यांगता कोई अभिशाप नहीं है, लेकिन समाज का उपेक्षित नजरिया दिव्यांगों की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। उन्हें चिढ़ाने या हीन भावना से देखने के बजाय, यदि सही अवसर और सुविधाएं प्रदान की जाएं, तो वे भी अपना भविष्य संवार सकते हैं। समाज को दिव्यांगों का मनोबल गिराने के बजाय उन्हें सहारा देना चाहिए, ताकि वे देश की प्रगति में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकें।" ये प्रेरणादायक विचार प्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर दीक्षा दिंडे ने व्यक्त किए।
वे स्थानीय स्व. देवकीबाई बंग अंग्रेजी माध्यमिक विद्यालय एवं कनिष्ठ महाविद्यालय तथा नेहरू विद्यालय एवं कनिष्ठ महाविद्यालय में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम में बोल रही थीं। दीक्षा दिंडे वर्तमान में अपनी 100 दिवसीय 'इन्क्लूजन' यात्रा के माध्यम से देशभर में दिव्यांग अधिकारों के प्रति जागरूकता फैला रही हैं।
अपनी जीवन यात्रा साझा करते हुए दीक्षा दिंडे ने कहा, "मेरा जन्म दिव्यांग के रूप में हुआ, जिसके कारण मुझे समाज में कई बार अपमान का सामना करना पड़ा। लेकिन मेरे माता-पिता ने मेरी अक्षमता पर ध्यान देने के बजाय मेरी शिक्षा पर जोर दिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत ही मैंने इतिहास में एम.ए. किया। आज मैं संयुक्त राष्ट्र (UN) की 'ग्लोबल यूथ एजुकेशन ब्रांड एंबेसडर' हूँ। मुझे भारत सरकार का 'राष्ट्रीय युवा पुरस्कार' और ब्रिटेन सरकार की प्रतिष्ठित 'चेवनिंग स्कॉलरशिप' भी मिली है। यदि मुझे सही अवसर न मिलते, तो मैं आज यहाँ तक नहीं पहुँच पाती'।
उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि आज भी देश में दिव्यांगों के लिए पर्याप्त अवसर और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। उन्होंने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर विशेष व्यवस्था करने की मांग की और छात्रों से अपील की कि वे दिव्यांगों को प्रेम और सम्मान दें, क्योंकि वे समाज का अभिन्न अंग हैं।
इस अवसर पर राज्य के पूर्व मंत्री एवं संत गमाजी महाराज शिक्षण संस्था के अध्यक्ष रमेशचंद्र बंग मुख्य रूप से उपस्थित थे। साथ ही संस्था की उपाध्यक्ष अरुणा बंग, कोषाध्यक्ष महेश बंग,अमोल सुतार, प्राचार्य नितिन तुपेकर, मुख्याध्यापक शशिकांत मोहिते, दिनकर लखमापुरे और ईशानी मित्रा भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की प्रस्तावना अरुणा बंग ने रखी और संचालन आनंद महल्ले ने किया। कार्यक्रम में दोनों विद्यालयों के छात्र बड़ी संख्या में मौजूद थे।

