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ग़ज़ल


तहरीर कर लिया है हर इक ज़िन्दगी का रंग 
तू भी तो देख ले ज़रा मेरी ख़ुशी का रंग 

नफ़रत मिली कभी कभी फटकार भी मिली 
मैं ने बहोत तलाश किया आशिक़ी का रंग 

मिलता हूँ उस से अब भी, उसे जान भी लिया 
ज़ाहिर नहीं किया कभी उस पे किसी का रंग 

मेरा वजूद उस में यूँ बर्बाद हो गया 
दरया कहाँ तलक के संभाले नदी का रंग 

मिन्नत, सवाल, इल्तेजा, सब राएगाँ गई 
भाने लगा है यार मुझे ख़मोशी का रंग 

मिलता रहा हर एक से ज़ाहिर नहीं किया 
खुलता नहीं किसी पे किसी आदमी का रंग 

बिछड़ा जो मुझ से में ने उसे अलविदा कहा 
देखा न उस ने मुझ में मेरी बेबसी का रंग 

मैं ख़ाक हूँ लिहाज़ा मुझे ख़ाक में ही रख 
ए दोस्त देख ये है मेरी ज़िन्दगी का रंग 

तहरीर-लिख लेना राएगाँ-व्यर्थ, अलविदा-विदा,

- समीर कबीर 
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 5212253573106087555
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