उलझन जिंदगी की
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हुजुम में रहकर भी हम अक्सर तन्हाई में बशर करते हैं।
कभी उम्मीद के सपनों का घरोंदा सजाया था,
अब उजड़ा चमन देख खुद पर ही हंसते रहते हैं।
क्या! इन सबका सवाल हैं हम?
ज़वाब भी इसका हमीं ढूंढते रहते हैं।
ज़िन्दगी का फलसफा आख़िर है क्या?
इसी उधेड़बुन में उलझे रहते हैं।
हालात ने सिखा दिया है गम को सहना,
इसलिए अब रूसवायी भी मुस्कुरा कर सहते हैं।
आगाज़ हुआ कहां से कुछ याद नहीं,
अंज़ाम खुदा की नेमत समझ वक्त संग ढहते रहते हैं।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र