आत्मबोध और भाग्य का आलोक और आज के ढोंगी साधुओं की कहानी
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प्रिय मित्रों मनुष्य का भाग्य किसी अदृश्य शक्ति की मनमानी रचना नहीं, बल्कि उसके अंतर्मन में अंकित आत्मबोध का प्रतिफल होता है। वह स्वयं को जिस दृष्टि से देखता है, उसी के अनुरूप उसके विचार, संकल्प एवं कर्म आकार ग्रहण करते हैं। यदि वह अपने भीतर केवल सीमाएँ देखता है, तो उसके जीवन की दिशाएँ भी संकुचित हो जाती हैं; किंतु जो अपने अस्तित्व में संभावनाओं का प्रकाश अनुभव करता है, उसके लिए प्रत्येक बाधा एक नवीन अवसर बन जाती है। आत्मदृष्टि ही जीवन की प्रथम नियति है।
वास्तव में, हमारा भाग्य भविष्य में लिखी हुई कोई रहस्यमयी पंक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान में पोषित विश्वासों का क्रमिक विस्तार है। आत्मविश्वास से युक्त व्यक्ति प्रतिकूलताओं में भी मार्ग खोज लेता है, क्योंकि वह स्वयं को पराजित नहीं मानता। अतः मनुष्य को अपने भीतर ऐसी दृष्टि विकसित करनी चाहिए जो उसे उसकी वास्तविक सामर्थ्य का बोध कराए। जब आत्मा स्वयं के गौरव को पहचान लेती है, तब भाग्य भी उसी पहचान का उज्ज्वल प्रतिबिंब बनकर प्रकट होता है।
उदाहरणार्थ जैसे- आज कल के तथाकथित साधु जिनको साधु तो कहना मुर्खतापूर्ण होगा वो तो पक्के सवाधु हो चुके हैं उन्हें सुख सुविधा से सुसज्जित जीवन चाहिये । विलासिता पूर्ण जीवन जीते हुए वैराग्य की शिक्षा देना वो अपना धर्म समझते हैं । सत्ता की चाटुकारिता करना इनका प्रमुख उद्देश्य होता है। धन के लोभी तो इतने हैं की जहां धनाढ्य व्यक्ति मिला तो उसको अपने माया जाल में ऐसे फांस लिया कि वो इनके मायाजाल से आजाद भी होना चाहे तो हो नहीं सकता।
तंत्र-मंत्र यंत्र और छत्रं के जरिये उसको ऐसा बांध देते हैं कि बेचारा वहीं छटपटा कर रह जाता है, चरित्र के तो ए भ्रष्ट होते ही हैं साथ ही साथ कुकृत्य करने में भी इनको जरा भी संकोच नहीं होता । दो लोगों के बीच में भी मतभेद और फूट कराकर आनन्द लेते रहते हैं। अपनी कही हुयी बात को भी ऐसे झुंठला देते हैं वक्त की नजाकत को देखते हुये कि जैसे उसको उन्होंने कभी कहा ही न हो। ए न सिर्फ लोभी, दंभी घमंडी और पाखंडी होते हैं बल्कि अव्वल दर्जे के धूर्त और व्याभिचारी भी होते हैं।
इनकी प्रवृत्ति भगवान ने कुछ अलग ही बनाकर भेजी हुयी है। इनपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। पहले के बड़े बुजुर्ग इसलिए कहावत कहा करते थे की खड़वा चन्दन मधुरी बानी धुर्त बाज की यही निशानी।
मेरा आशय सभी संतो के लिये न होकर कुछ ऐसे तथाकथित साधुओं को लेकर है जो समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने की बजाय खुद भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को लांघ गये हैं आज समय की आवश्यकता है की ऐसे साधुओं को पहचानें और सतर्क रहें। इसी साधुवाद के साथ मैं अपनी भावाभीवय्क्ति को विराम दे रहा हूं।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र