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अंतर्मन का उद्घोष


किताब समीक्षा

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प्रतिष्ठित लेखिका शशि दीप का सामाजिक सरोकारों पर उनकी समृद्ध लेखनी का जीवंत दस्तावेज है। जिसका शानदार प्रकाशन समृद्ध प्रकाशक, दिल्ली द्वारा किया गया है। (ISBN: 978.93.94837.56.0) मूल्य : 299.00 रु. (पेपरबैक )

लेखिका ने अपनी कृति 'अंतर्मन का उद्घोष' को मूल रूप से अपनी जननी को उनके आदर्श, संस्कारों के साथ श्री चरणों को समर्पित की है। यह उनके उज्जवल संस्कारों की ही धाती हैं। वह लिखती है कि 'जीवन में मेरी माता, उनके संस्कार और विशेषकर उनके आदर्श, शिक्षा और मेरी रक्त वाहिनियों में लहू की भांति तरंगित होने वाली उच्च संस्कृति उन्हीं की दी हुई हैं। आज वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी छाया आज भी मुझे आशीष से सराबोर कर रही है। मेरे अंतर्मन में उसी  ने एक नवीन ऊर्जा का प्रवाह किया और नवीन विचारों को समाहित कर मैंने इस नवीन कृति को साकार रूप प्रदान किया है।' जिस व्यक्तित्व को यशस्वी संस्कारों ने पोषित किया है, निश्चित ही वह व्यक्तित्व देश, समाज के साथ साथ इस वैश्विक धरातल को अपने पुनीत कर्मों से धन्य करेगा। ऐसी ही समृद्ध सोच को शब्द रूप में ज्योतिर्मय किया है शशि दीप ने।

जीवनोपयोगी गहन अवधारणाओं को सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ परिवर्तन की दिशा में प्रोत्साहित करना पुस्तक  में अद्वितीय बन पड़ा हैं। प्रस्तावना में 'जीवन को हमेशा अपने अस्तित्व से महसूस करना चाहिए, सतही तौर पर नहीं, और इससे किसी भी घटना को भावनाओं के साथ स्वीकार करने में मदद मिलती है। इस पुस्तक में प्रस्तुत प्रत्येक घटना हमें लोगों के अनुभवों का मूल्य और जीवन की साधारण चीजों का आनंद लेना सिखाती है। इस पुस्तक को पढ़ने का गहन तरीका कथा की अंतर्दृष्टि को महसूस करना है। सबसे अच्छा तरीका है, खुले मन से पढ़कर और बच्चों जैसी मासूम खुशी का आनंद लेकर इसका आनंद लेना।' मै लेखक के कथ्य से शत प्रतिशत सहमत हूं। पुस्तक प्रकाशन को लेकर शुभकामनाएं प्रेषित करने वाली विशिष्ट विभूतियों के संदेश, निसंदेह शशि दीप जी की प्रतिष्ठा का द्योतक है। प्रेरणीय कर्मशीलता हेतू मेरा भी साधुवाद स्वीकारे।

श्रद्धा और आस्था, विश्वास के मूल भाव को आत्मसात कर अपनी परंपराओं को जीवंत रखते हुए पुस्तक का आरंभ ही संस्कृति, संस्कारों का बोध कराता है। समाज में नैतिक मूल्यों के पतन पर बदलते दौर पर चर्चा अच्छी लगी।परंपरागत अनुष्ठानों और उनके अनुपालन पर सटीक बात है कि नैतिक मूल्यों के धारण करने पर ही चारित्रिक और भावनात्मक बल को मजबूती मिलती है। पर्वो पर पवित्र भावों का विनिमय हमें मानवीय संवेदनाओं को पोषित करने में मदद करता है। यह सत्य है। विविधताओं के बावजूद मानवीय भावनाओं को समझना और अपने विचारों का क्रियान्वयन हमें सकारात्मक दृष्टिकोण से जोड़ता है। 

लेखिका ने सामाजिक व्यवस्थाओं पर पैनी दृष्टि बनाते हुए महत्वपूर्ण बिंदुओं को लेकर चर्चा की है। शिक्षा हो अथवा दूसरे सामाजिक बिंदुओं पर हमारी प्रतिबद्धता खुले मन से इस पर बात की गई है। वैश्विक परिवर्तन के दौर में विभिन्न संस्कृतियों के बीच पनपते, बदलते हालातों पर भी लेखिका ने तथ्यात्मक विचार मंथन किया है। समाज में महिलाओं, बच्चों, बुजर्गो के प्रति व्यावहारिक परिस्थितियों पर गहराई से ध्यान आकर्षण किया गया है। देशी और विदेशी कल्चर पर पक्ष रखते हुए  सकारात्मक, नकारात्मक प्रभावों को पुस्तक में बताया गया है। मानवीय मूल्यों के क्षरण पर चिंता जताई गई है तो समाधान के भी रास्ते बताए गए हैं। 

राष्ट्रवाद हो अथवा स्वाभिमान के साथ जीवन शैली, जीवन पथ के सभी पहलुओं पर पुस्तक में उत्कृष्ट विचारों का समावेश है,जो इस पुस्तक को महत्वपूर्ण बनाता है। वर्तमान समय में पनपी सोशल इंलुएंसर्स आदि पर गंभीर मंथन किया गया है। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्थाओं पर पैनी नजर रख लेखिका ने अनछुए मुद्दों पर बेबाकी से सटीक, व्यवहारिक बात की है। यह उनका बहुआयामी चिंतन है। खास दिनों का बढ़ता प्रचलन हो अथवा  आडम्बरों, पाखंड , कुरीतियों से डूबता समाज , इस पर हम सभी के नैतिक कर्तव्यों के निर्वहन के तमाम बिंदु विश्लेषित किए गए हैं। 

चेतनात्मक,भावात्मक अनुभूतियों को आत्मसात कर मानव अपने मूल्यवान जीवन का निर्वाह बखूबी कैसे कर सकता है। लेखिका ने मानवीय पहलुओं को सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों के साथ बारीकी से विश्लेषित कर इस पुस्तक को आज के भारतीय समाज के लिए पठनीय पुस्तक के रूप में सृजित किया है। विविध विषयों पर शानदार अभिव्यक्ति पुस्तक को विशेष बनाती है। प्रेरणीय विचार, जीवन में नये आयाम स्थापित कर सकेंगे। एक लेखक का उद्देश्य होता भी यही है । 
 
सामाजिक सरोकार  पर आधारित पुस्तक समाज और साहित्य के बीच के संबंधों का दर्पण होती है।एक अच्छी  पुस्तक के मुख्य संदेश, उसकी प्रासंगिकता और समाज पर उसके प्रभाव का विश्लेषण करती है। इस पुस्तक का सकारात्मक पक्ष, लेखन शैली,भाषा  सहज, प्रभावशाली और आम जनमानस की समझ के अनुकूल है।यथार्थ के करीब है। लेखिका का एक संतुलित दृष्टिकोण है। कह सकते हैं कि यह पुस्तक आज के  युग में  प्रासंगिक है। यह भी कि व्यक्तित्व और कृतित्व की उत्कृष्टता सृजन को आकाश प्रदान करती है, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। शशि दीप जी की यह कृति मानवीय संवेदनाओं की रक्षार्थ महती भूमिका निभाएगी। मैं पूर्ण रूपेण आशावान हूं। आपका सृजन नित नए आयाम स्थापित करें, मेरी अतिशय शुभकामनाएं।

- डॉ. राकेश छोकर 
   विश्व कीर्ति धारक साहित्यकार एवं पत्रकार 
   नई दिल्ली/सहारनपुर, उत्तर प्रदेश।
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