रिश्तों की अहमियत
बहता हुआ नदी का जल समन्दर तक पहुंच ही जाता है,
रूका हुआ पानी स्थिर हो कर बढ़ नहीं सकता।
वृक्ष चाहे कितना ही बड़ा मजबूती से क्यों न खड़ा हो,
आंधी और तूफान के आगे देर तक वह टिक नहीं सकता।
अकसर झूठों की मजलिस में हक़ीक़त हार जाती है,
मगर सूरज की रौशनी में अंधेरा टिक नहीं सकता।
छुपालो सच को चाहे लाख पर्दे में,
लेकिन वक्त की मार से वह बच नहीं सकता ।।
टूटे हुये रिश्ते कभी जुड़ नहीं सकते
लाख कलीयां हों खुशबुओं से भरी पर
उस गली में दुबारा मुड़ नहीं सकते
हताश ह्रदय मायूस हो उदासी का दामन थाम ले,
पर विश्वास टूट जाये तो अरमां उड़ नहीं सकते।।
खुदगर्ज बन कर जो रिश्तों की अहमियत समझ नहीं सकता,
विपत्तियों में वो कभी किसी के काम आ नहीं सकता।
सच की राह पर चलना सीख ले तू *मिश्र*
शिखर पर मेहनत के सिवा कोई चढ़ नहीं सकता।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र