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संधिपथ -चेतना का उर्ध्व स्वर




पुस्तक समीक्षा

कवि- संतोष बादल
समीक्षक- इन्दिरा किसलय
प्रकाशक- इंडिया नेटबुक नोएडा
मूल्य- 225/-
पृष्ठ- 104

कविता मनुष्य की मुक्ति की तरह है, जो भाषा और भावों को संकुचित दायरे से बाहर निकालती है- महाप्राण निराला की ये पंक्तियां समीक्ष्य कृति के प्रणेता संतोष बादल की सृजनशीलता के संदर्भ में देखें, तो बादल इस अभिधान में उनकी अंतरात्मा की किरणमयी उष्मा है, जो समुद्र के नमकीन जल को मीठा बना देती है। उनके काव्यालय की यही उपलब्धि है ,उनके सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्धता की तह में यही सोच है।
प्रकृति प्रेरणा है, हर संवेदन सृजन की साक्षी। अंतरोद्वेलन को सम्भालने वाली मित्र भी।उसी का साथ लेकर कवि बादल व्यष्टि से समष्टि तक संचरण करते हैं। उनके स्व का अनन्त विस्तार उन्हें कभी उद्बोधक की भूमिका में पेश करता है, तो कभी पर्यावरण चेतस, तो कभी राष्ट्रवाद का ध्वजवाहक बना देता है।
सच्चा कवि आत्मरति का शिकार नहीं हो सकता. उसके स्वरों में विश्वमन की वेदना की अनुगूंज सुनाई देती है।बादल अपवाद कहां। वे पल-पल स्वयं को चेताते हैं, और स्व की परिधि से बाहर निकाल लाते हैं।
जीवन है, तो नींद, स्वप्न, जागरण और समर की स्थिति भी है. वे चेतना के जागरण का आह्वान करते हैं।
तू समय की व्यथा लिख अब, तू न अपनी कथा लिख अब।। छल प्रपंच से भरे भौतिक जगत के संकेत उन्हें पल-पल मंथन को विवश करते हैं।
झेल आया दंश सारा, दूर है फिर भी किनारा।।
कोई मधुमय राग छेड़ तू, बजता इकतारा बन जा। जीवन सरिता के किनारों को रसार्द्र कर जाने का वादा उन्होंने स्वयं से किया है।  यही आत्मस्वीकृति चेतना का उर्ध्व स्वर है।सांगीतिक तरंगों का कोमल नाद सुनने, सुनाने की तैयारी।
बादल मेघों से प्रतिश्रृत हैं। उन्हीं की तरह जल का स्वरूप बदल देने की सामर्थ्य रखते हैं। जल से आशय है, जगत जीवन में फैली हुई प्रतिकूलताओं को एक आशावादी आश्वासन में बदल देते हैं।
 कविकुल गुरु टैगोर एवं निराला के मन पर भी बादल ही छाये रहे।
उनके अंतर्मन की अकूत गहराई में पीड़ा की स्रोतस्विनी बहती है, जिसका उद्गम उन्हें नहीं पता, पर कविता में वह प्रतीक बनकर कलनाद करती है।वह चिरसंगिनी है- तटिनी पीर बताए किस से, नदी की पीड़ा, है नदी की पीर गहरी, नदिया ने जीवन रणहारा, जैसी कविताओं में नदी की पीर पिघल कर बादल की कलम में समा गई है। नदिया खुद से ही रूठ गई, किस्मत भी शायद फूट गई, कैसे घुट-घुट कर मरती है, रह गया दूर सागर सारा।।
बादल के मन की हर कौंध, उहापोह, आशा निराशा, संघर्ष, श्रम और आह्वान, हर तरंग ने कविता का रूप धरा है। सर्वहारा के प्रति उनके मन में अपार करुणा तरंगायित होती है.।वे मात्र प्रकृति की अनन्य रूप सुषमा के चितेरे नहीं, घोर यथार्थवादी चिंतन के प्रस्तोता भी हैं।

उनके पथ पर दीप जला दें, यही उनकी कामना है। परिचय, अधिकार नहीं है, अपनी तो बस नीली छत है, कैसे दिखलाऊं, जैसी कविताओं में पीड़ा के संस्कार सुलभ हैं। न्यायपालिका की बेबसी या वस्तु स्थिति को वे इस तरह व्यक्त करते हैं-, चंद सिक्कों की चमक में, है यहाँ पर न्याय बिकता 'पर्यावरण संरक्षण उनके सृजन का मूल स्वर है- डगमग डोल रही धरती में जो ध्वनित हुआ है। आशा का दामन कब छूटता है- वे कह उठते हैं- कोयल फिर पंचम स्वर गाओ, नितान्त अलग तेवर की कविता भी है- मैं पीसा की मीनार बेच दूँ, मैं चीन की दीवार बेच दूँ, 
धर्म बेच दूँ, जाति बेच दूँ, यह सारी सरकार बेच दूँ, मुझको यदि मिल जाए सारे लाखों लाख सितारे।
उनका पक्का विश्वास है, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. आत्मानुसंधान के क्रम में वे प्रकाश प्राप्त करते हैं, जो जीवन की स्वभाविक मांग है- दीप जलने दो निरंतर, वे राष्ट्रवाद को कुछ इस अंदाज में लेखनी को सौंप देते हैं- मातृभूमि, देश न अस्थिर होने देंगे, आदर्श हमारा, यह आह्वान परक कविताएं पाथेय  हैं। 

एक हाथ में कलम तुम्हारे, एक हाथ में असि है, तेज धार हो असि की तेरे, भरी कलम में मसि हो, अंततः वे पथ अपरिचित में असंग दार्शनिकता से घिर जाते हैं।एकला चालो रे की तर्ज पर पूर्ण आश्वस्ति के साथ चल पड़ते हैं। समय कभी लौट कर नहीं आता. वे स्वयं से स्वगत संवाद करते हैं- नयना भिराम कुछ भी न था, उड़ना होगा तुझे निरंतर, तब जाकर कर पाएगा, धरती और गगन का अंतर। जब जब जनम मैं पाऊं, विधाता। मुझे मिले बस भारत माता।।

संवेदन शीलता उतनी ही सजगता, भावुकता और चैतन्य उनके सृजन धर्म का मूल स्वर है। बादल समूची कविताओं में अपनी मौलिक उतनी ही शास्त्रीय शैली के साथ विराजित हैं। भाषायी अभिजात्य को लेकर वे मानक उपस्थित करते हैं।
इंडिया नेटबुक्स नोएडा की यह प्रस्तुति  सर्वकाल अभिनंदनीय है।


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