रिश्तों की बिखरती लकीरें



छा रहा घना अंधेरा आस-पास में, 

लग गयी है घुन बहुत विश्वास में ।।


रिश्तों  का शब्द जैसे हो चला बेमानी, 

खोट दिखने लगी है अब आभास में ।। 


जान हथेली पर उड़ेल कर भी रख दो ,

पर भरोशा अब जम नहीं सकता खास में ।। 


किस पर यकीं भला करें अब, मिश्र जब 

साथी ही घात लगाये बैठा हो पास में ।। 


अब समय आता जा रहा है बड़ा विकट,

कैसे समाहित हो सकें हर  की साँस में ?।।


- रामनारायण मिश्र

   नागपुर, महाराष्ट्र 


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