बॅलेट पेपर को जनादेश, जनता का जवाब !




नतीजे से भाजपा को झटका, चुनाव आयोग की पारदर्शिता और ‘जेन ज़ी’ की राजनीतिक चेतना की कसौटी पर लोकतंत्र


          नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय है। इसे भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख राजनीतिक गढ़ों में गिना जाता है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की राजनीतिक कर्मभूमि भी नागपुर ही है। ऐसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के अभिजीत वंजारी का भाजपा के सुधाकर कोहळे को पराजित करना केवल एक सीट की हार-जीत नहीं है। यह सत्ता के आत्मविश्वास, संगठनात्मक ताकत और मतदाताओं की बदलती सोच पर विचार करने का अवसर है। अभिजीत वंजारी को 67,231 मत मिले, जबकि सुधाकर कोहळे को 63,960 मत प्राप्त हुए। जीत का अंतर 3,271 मतों का रहा। यह परिणाम सत्ताधारी दल के लिए चेतावनी की घंटी साबित हो सकता है। इससे लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत फिर सामने आया है, राजनीतिक गढ़ किसी भी दल की स्थायी जागीर नहीं होते। मतदाताओं का विश्वास बार-बार अर्जित करना पड़ता है; उसे कभी भी स्थायी मानकर नहीं चला जा सकता।


          स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होता है। इसमें मतदाता को मतपत्र पर उम्मीदवारों के सामने अपनी पसंद का क्रम अंकों में दर्ज करना होता है। पहली पसंद के लिए ‘1’ और उसके बाद नियमानुसार अगली पसंद के अंक लिखे जाते हैं। निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं होने पर मतपत्र अमान्य घोषित किया जा सकता है। नागपुर के चुनाव में बड़ी संख्या में मत अमान्य होने की बात गंभीर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी है। रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 15 हजार मत अमान्य हुए। इतनी बड़ी संख्या यह सवाल उठाती है कि क्या मतदाताओं को मतदान की सही प्रक्रिया और पसंद का क्रम दर्ज करने के नियमों की पर्याप्त जानकारी दी गई थी? स्नातक मतदाताओं वाले निर्वाचन क्षेत्र में भी यदि बड़ी संख्या में मतपत्र अमान्य हो जाते हैं, तो मतदाता जागरूकता अभियान की प्रभावशीलता की समीक्षा जरूरी है। नमूना मतपत्र उपलब्ध कराना, मतदान केंद्रों पर स्पष्ट निर्देश देना, मतदाताओं को सही जानकारी देना और मतदान से पहले नियमों को सरल भाषा में समझाना चुनाव व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। नियमों के अनुसार मतदाता की गलती के कारण उसका मत अमान्य हो सकता है। लेकिन नागरिकों को यह पूछने का भी अधिकार है कि नियमों को समझाने में चुनाव तंत्र की ओर से कोई कमी तो नहीं रह गई। मतदान गोपनीय रहना चाहिए, लेकिन मतगणना की प्रक्रिया संदेह के घेरे में नहीं रहनी चाहिए।


          चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। उसके कामकाज पर उठने वाले सवालों को केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि, पर्याप्त प्रमाण के बिना आयोग पर पक्षपात का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं है। लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि प्रक्रिया पारदर्शी हो, नियमों का समान रूप से पालन हो और नागरिकों की शंकाओं का समय पर समाधान किया जाए। मतगणना के दौरान किसी मतपत्र पर आपत्ति उठती है, तो निर्णय का आधार स्पष्ट होना चाहिए। अमान्य मतों से जुड़े नियमों का समान रूप से पालन हुआ या नहीं, अधिकृत प्रतिनिधियों को नियमानुसार निरीक्षण का अवसर मिला या नहीं और शिकायतों का निपटारा कैसे किया गया। इन विषयों पर आवश्यक जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। उचित सवालों का जवाब देना किसी संस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास मजबूत करने का अवसर है। चुनाव में हारने वाला दल हर पराजय के लिए चुनाव आयोग को दोषी ठहराए, यह भी उचित नहीं है। लेकिन नागरिकों के जायज सवालों का जवाब न देना भी उतना ही गलत है। लोकतंत्र में चुनाव परिणाम को स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन उस परिणाम तक पहुंचने वाली प्रक्रिया पर जनता का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।


         नागपुर जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण शहर में भाजपा की हार को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। संगठनात्मक ताकत, प्रभावशाली नेता, व्यापक प्रचार तंत्र और सत्ता के संसाधन होने के बावजूद जीत की गारंटी नहीं होती।स्नातक मतदाता शिक्षा, रोजगार, महंगाई, प्रशासन, सामाजिक वातावरण और सरकार के कामकाज को अलग दृष्टि से परख सकता है। इस एक परिणाम को पूरे महाराष्ट्र या देश के मतदाताओं द्वारा भाजपा के खिलाफ दिए गए एकतरफा जनादेश के रूप में देखना अतिशयोक्ति होगी। महाराष्ट्र के संबंधित पांच निर्वाचन क्षेत्रों में महाविकास आघाड़ी ने तीन, जबकि महायुति ने दो सीटें जीतीं। फिर भी नागपुर का परिणाम प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। यह बताता है कि जहां किसी दल को अपनी स्थिति मजबूत और सुरक्षित लगती है, वहां भी मतदाता विकल्प चुन सकते हैं। सत्ताधारी दल को विपक्ष की जीत को केवल संयोग मानकर नहीं टालना चाहिए। स्थानीय समस्याओं, मतदाताओं की अपेक्षाओं, उम्मीदवारों के प्रति धारणा और सरकार के कामकाज पर जनता की प्रतिक्रिया का अध्ययन होना चाहिए। लोकतंत्र में जनता का जनादेश आत्ममंथन का अवसर होता है, जनता को कमतर आंकने का नहीं।


         आज की युवा पीढ़ी, जिसे ‘जेन ज़ी’ कहा जाता है, मोबाइल, डिजिटल माध्यमों, त्वरित समाचारों और विविध विचारधाराओं के बीच बड़ी हुई है। उसके सामने जानकारी के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं। वह राजनीतिक दावों पर सवाल उठा सकती है, सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज पर चर्चा कर सकती है और रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता तथा समान अवसर जैसे मुद्दों को महत्व दे सकती है। हालांकि, नागपुर के चुनाव परिणाम को केवल ‘जेन ज़ी’ के प्रभाव का नतीजा बताने के लिए स्वतंत्र प्रमाण जरूरी हैं। इसके बावजूद किसी भी राजनीतिक दल को युवा मतदाताओं की बदलती अपेक्षाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जब मतदाता नारों से अधिक परिणामों, प्रचार से अधिक जवाबदेही और व्यक्तिपूजा से अधिक नीतियों के मूल्यांकन को महत्व देने लगते हैं, तब राजनीति को भी अधिक जिम्मेदार बनना पड़ता है। युवाओं को केवल भावनात्मक अपीलों के आधार पर लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखना संभव नहीं है। उन्हें रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, न्यायपूर्ण व्यवस्था और भविष्य के प्रति विश्वास चाहिए। जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो मतदाता विकल्प तलाशते हैं। यह लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।


          नागपुर के परिणाम से कांग्रेस को जीत की खुशी मिली और भाजपा को पराजय का झटका लगा। लेकिन इन राजनीतिक समीकरणों से बड़ा प्रश्न यह है कि चुनाव प्रक्रिया पर नागरिकों का विश्वास कैसे मजबूत किया जाए? मतदाता जागरूकता, पारदर्शी मतगणना, शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा और चुनाव नियमों की स्पष्ट जानकारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। विपक्ष को भी जीत के उत्साह में जनता की अपेक्षाओं को नहीं भूलना चाहिए। सत्ता हासिल करना या उसे बनाए रखना राजनीति का हिस्सा है, लेकिन जनता के सवालों का जवाब देना लोकतंत्र का दायित्व है।      भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई अन्य दल, जनता का विश्वास किसी की स्थायी संपत्ति नहीं है। उसे कामकाज, ईमानदारी और जवाबदेही के माध्यम से अर्जित करना पड़ता है। मतपत्र केवल कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक के विश्वास की मुहर है। उसका सम्मान होना चाहिए। 


          नागपुर का परिणाम भाजपा के लिए चेतावनी, कांग्रेस के लिए अवसर और अन्य दलों के लिए अध्ययन का विषय हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र के लिए इसका संदेश स्पष्ट है, मतदाताओं को हल्के में न लें, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों को शत्रु न समझें और पारदर्शिता की मांग को लोकतंत्र-विरोधी न मानें। लोकतंत्र में सबसे बड़ा नेता, सबसे बड़ा संगठन या सबसे प्रभावी प्रचार तंत्र अंतिम निर्णायक नहीं होता। निर्णायक होता है मतदाता का विवेक और उसके मत का सम्मान। सत्ता बदल सकती है, राजनीतिक गढ़ ढह सकते हैं और समीकरण उलट सकते हैं। लेकिन यदि जनता के विश्वास को चोट पहुंचती है, तो किसी भी दल का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता। लोकतंत्र की वास्तविक जीत तभी होगी, जब प्रत्येक वैध मत का सम्मान हो और प्रत्येक जायज सवाल का पारदर्शी जवाब मिले।


- प्रवीण बागडे

   लेखक, साहित्यकार एवं सामाजिक विश्लेषक

   नागपुर, महाराष्ट्र, मो.: ९९२३६२०९१९


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