लोक संस्कृति, साहित्य और जनजातीय परंपराओं का योगदान अविस्मरणीय : प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा
प्राक् लोक मन्थन 2026 में लोकबोलियों, लोकगीतों और लुप्त होती परंपराओं के संरक्षण पर हुआ विमर्श
नागपुर/उज्जैन। अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास, नई दिल्ली एवं सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित प्राक् लोक मन्थन 2026 में भारत की लोक सांस्कृतिक संपदा, लोक साहित्य, जनजातीय परंपराओं और लुप्त होते लोकाचारों के संरक्षण पर विद्वानों ने विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि देवदास साकेत, रीवा तथा मुख्य वक्ता विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं संस्कृतिविद् प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिव चौरसिया ने की। विशिष्ट अतिथि ललित कला विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा तथा आकाशवाणी के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. ब्रह्मप्रकाश चतुर्वेदी रहे।
प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि भारत की आत्मा लोक साहित्य, लोक कलाओं और जनजातीय संस्कृति में बसती है। लोक संस्कृति प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक चेतना का संदेश देती है। उन्होंने लोक कलाकारों, मौखिक इतिहास, लोकबोलियों और परंपराओं के दस्तावेजीकरण तथा डिजिटल माध्यमों से संरक्षण पर बल दिया।
डॉ. देवदास साकेत ने लोकबोलियों, शब्दरचना और शब्दकोश निर्माण की आवश्यकता बताई। डॉ. शिव चौरसिया ने कहा कि लोक और शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा ने लोक और शास्त्र के समन्वय पर जोर दिया। डॉ. ब्रह्मप्रकाश चतुर्वेदी ने लुप्त होते लोकाचारों के संग्रह एवं डिजिटल संरक्षण की आवश्यकता बताई। मालवा प्रांत के लोक साहित्य प्रमुख डॉ. प्रवीण जोशी ने लोक साहित्य की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया, जबकि डॉ. राजेश रावल सुशील ने लोकगीतों को उनकी मूल लोकधुनों में प्रस्तुत करने पर बल दिया।
कार्यक्रम में राजकुमारी सोलंकी एवं समूह, देवास तथा ज्योत्सना गोमे, इंदौर ने लोकगीत प्रस्तुत किए। कमल अंजना ने मालवी कविता पाठ किया। अतिथियों एवं कलाकारों का स्मृति चिह्न, मौक्तिक माला, अंगवस्त्र, नारियल और साहित्य भेंट कर सम्मान किया गया।
आयोजन में डॉ. ललित नागर, राजेश शर्मा, श्रीमती वंदना जैन, संध्या पुरोहित, अंकित शर्मा, डॉ. प्रीति जोशी, मुक्तेश त्रिवेदी, सौरभ अवस्थी, डॉ. सुमन जैन, विजिया जैन, मधु गुप्ता, प्रियंका जोशी, राजेश तिवारी, जितेंद्र मालवीय, राजेश ठाकुर, डॉ. लक्ष्मी मेहर, डॉ. रश्मि, डॉ. नेत्रा रावणकर, डॉ. वी.के. सक्सेना, डॉ. अभिलाषा शर्मा, नितिन पॉल, कला गुरु एल.एन. सिंहरोड़िया, डॉ. महिमा मरमट, सपना पंचोली, राजेंद्र गुरु, श्री मिमरोट, पूजा परमार, अजय सूर्यवंशी, दिग्विजय द्विवेदी और राकेश सहित अनेक साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं शोधकर्ता उपस्थित रहे। संचालन डॉ. ललित नागर ने किया तथा आभार संयोजक डॉ. प्रवीण जोशी ने माना।



