आर्थिक खेती के लिए सिल्क और मिल्क की ओर चलें किसान
ग्रामायण ज्ञानगाथा में डॉ. अधिकराव जाधव का प्रतिपादन
नागपुर। ठंड में ऊबदार और गर्मी में ठंडे रहने वाले वस्त्र के रूप में रेशम विश्व प्रसिद्ध है. रेशम केवल वस्त्र तैयार करने में ही नहीं अपितु सुगंधित वनस्पति व औषधोत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए महाराष्ट्र के किसानों को मुख्य फसल के रूप में रेशम की खेती पर ध्यान देना चाहिए. ‘सिल्क मिल्क व मीट’ का मंत्र विश्व ने स्वीकार कर लिया है.
अब भारत को भी इसे स्वीकार करना पड़ेगा. इसके लिए इस उद्योग को सरकारी मदद आवश्यक है. उक्त प्रतिपादन रेशम संशोधन व संवर्धन क्षेत्र का 27 वर्षों का अनुभव रखने वाले रेशम दूत डॉ. अधिकराव जाधव ने किया. ग्रामायण प्रतिष्ठान नागपुर की ओर से फेसबुक लाइव अंतर्गत ‘ज्ञानगाथा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. इस दौरान वे ‘रेशम संशोधन एवं विस्तार कार्य’ विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे. डॉ. विजय घुगे ने कार्यक्रम का संचालन किया.
इस अवसर पर जाधव ने कहा कि विदर्भ में संतरा, कपास और सोयाबीन बड़े पैमाने पर होता है. आज भी किसान फसल आधारित खेती करते हैं परंतु अब आर्थिक खेती भी करनी चाहिए. इसलिए जोड़ व्यवसाय के रूप में भी रेशम पालन और मुर्गी पालन किया जा सकता है. अब समय बदल गया है. इसलिए किसानों को रेशम खेती को अपनाना चाहिए. रेशम की खेती के लिए शहतूत के पेड़ लगाने पड़ेंगे. उस पर रेशम कीटों का संगोपन होता है. पत्ते खाकर बड़ा हुआ रेशम कीट एक माह में संगोपन केंद्र में जाता है. यह कार्य यदि घर केसदस्य ही करते हैं तो किसान इससे भरपूर मुनाफा कमा सकता है. उसे इसके लिए वैज्ञानिक तकनीक की सहायता लेनी पड़ेगी.
खेती से जुड़े कामगारों से लेकर बाजार में रेशम वस्त्र विक्रेताओं तक प्रत्येक के लिए यह व्यवसाय समृद्धि का मार्ग सिद्ध होगा. विश्व के कुछ देशों ने शहतूत के पत्तों का उपयोग मुर्गी पालन, गोपालन व बकरियों के खाद्य के रूप में भी किया. इससे दूध उत्पादन व मुर्गी पालन में भी उन्हें फायदा हुआ. यही तकनीक अब हमें भी स्वीकार करनी पड़ेगी. मूल रूप से सांगली के रहने वाले अधिकराव जाधव ने रेशम संशोधन व प्रसार का महत्वपूर्ण कार्य किया है. शिवाजी विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करनेवाले जाधव ने भारत सहित अनेक देशों में किसानों का मार्गदर्शन किया है.
