‘कन्फर्ट जोन' से बाहर निकलकर लेखन करें व्यंग्यकार : सुभाष चंदर
व्यंग्यधारा की उनतालीसवीं ऑनलाइन वीडियो गोष्ठी
नागपुर। व्यंग्यकार को कन्फर्ट जोन से बाहर निकलकर लेखन करना चाहिए, तभी हम व्यंग के साथ न्याय कर पाएंगे। नये प्रयोग कर पाएंगे। अपने वक्तव्य में वरिष्ठ व्यंग्यकार सुभाष चंदर (दिल्ली) ने कही। व्यंग्यधारा की उन्तालीसवीं ऑनलाइन वीडियो गोष्ठी का आयोजन रविवार को किया गया, जिसमें अभिनव प्रयोग करते हुए ‘इस माह के व्यंग्य' के अंतर्गत आठ व्यंग्यकारों के व्यंग्य रचनाओं पर चर्चा की गई।
इस अवसर पर प्रमुख वक्ता के रूप में सुभाष चंदर ने मुकेश राठौड़ की रचना ‘शिक्षा और साहित्य का स्वर्णकाल' तथा रामस्वरूप दीक्षित की रचना ‘भड़काना सरकार का काम है' पर अपनी बात रखते हुए कहा कि आज लोग आंदोलन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने रचनाओं पर गंभीरता से विश्लेषण करते हुए कहा व्यंग्य का शीर्षक व्यंग्य काे ही होना चाहिए। व्यंग्य व्यक्ति पर नहीं, बल्कि प्रवत्ति पर किया जाना चाहिए। तत्कालीन विसंगतियों को नजरअंदाज करना व्यंग्य के साथ अन्याय है।
इंदौर से वरिष्ठ व्यंग्यकार सुधीर कुमार चौधरी ने राजशेखर चौबे के व्यंग्य ‘हाय री पब्लिक' पर बात रखते हुए कहा कि उक्त व्यंग्य में एक पक्ष पर चुटकी ली गई है, पर व्यंग्यकार को सापेक्ष नहीं होना चाहिए, दोनों पक्ष की विसंगति को उजागर करना चाहिए, अन्यथा मुद्दों में अधूरापन समझ आता है। एक पक्षीय लेखन अंत में आपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकती है। अभिषेक अवस्थी के व्यंग्य ‘उस देश का नया चर्चा भवन' की समालोचना करते हुए कहते हैं कि यह रचना मुखरता से अपनी बात कहती है। रचना का एक वाक्य हम योजना बनाते हैं और खाते हैं।' यह करारी चोट हैं। वे आज की राजनीतिक प्रवृत्ति पर गहरी चोट है।
सुधीर कुमार चौधरी ने रचना पर अपनी असहमति जताते होते हुए कहा कि रचना में तथ्यात्मक जानकारी सटीक होनी चाहिए। पंच लाइन "चुप रहने वाले इस अनोखे देश में प्रश्न करने वाला महामूर्ख होता है' व्यंग्य की आत्मा है। रचना में राजनीतिक अपराधीकरण पर लिखने की बहुत गुंजाइश थी, पर लेखक ने नहीं लिखी।
वरिष्ठ व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने संतोष त्रिवेदी के व्यंग्य "इस मौसम में स्नान का साहस' को हास्य प्रधान रचना बताते हुए कहा कि बाथरूम में नहाने के बाद नहाने के साक्ष्य अच्छे दिन आने के साबूत है। लेखक का कहना है कि "अगर दूसरा बहाना नहीं होता, तो मैं जलसंरक्षण का बहाना बना देता’ यह चुटकी है। इसमें व्यंग्य कमजोर नजर आ रहा है। इस समय ऐसे व्यंग्य अधिक लिखे जा रहे हैं, जिनमें सरोकार नहीं है। वरिष्ठ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी के व्यंग्य ‘तेरे इस हठ का मैं क्या करूँ’ में बाल हठ, स्त्री हठ और राजहठ पर संकेतों में बातचीत की। जब किसान आंदोलन के संदर्भ में किसान हठ को लेकर बात की, तो वे सत्ता पक्ष में खड़े नज़र आते हैं। यह बात खटकती नज़र आती है।
व्यंग्य का उद्देश्य छद्म और छल को उद्घाटित करना : विनोद साव
आयोजन के प्रमुख वक्ता वरिष्ठ व्यंग्यकार विनोद साव ने कहा कि व्यंग्य का उद्देश्य छद्म और छल को उद्घाटित करना है। इसके लिए हौसला चाहिए। व्यंग्य की शैली, शिल्प, कथ्य और भाषा पर ध्यान दिया जाना चाहिए। अखबारी स्तंभ ने व्यंग्य को स्थापित किया। अखबार की रचना जनता की रचना है। उन्होंने डॉ अजय जोशी के व्यंग्य "मंगू का आईडिया’ में राजनेताओं के छल- प्रपंच पर तीखा व्यंग्य किया है। यह रचना टेलीफोनिक टाक है।
आजकल गरीब के घर खाने को लेकर है, जहां गरीब व्यवस्था करता है और नेता फोटो खिंचाकर पूरा श्रेय ले लेता है और गरीब कहीं नहीं है। वेद प्रकाश भारद्वाज के व्यंग्य "बजट का हलवा’ विवरणात्मक रचना है। स्थितियों का चित्रण है। संवैधानिक रचना है। यह व्यंग्य के पुराने ढर्रे से हटकर रचना है।
कार्यक्रम की भूमिका और संचालन करते हुए व्यंग्यकार रमेश सैनी (जबलपुर) ने कहा कि इस गोष्ठी में व्यंग्यधारा समूह ने नवीन संकल्पनाओं के साथ नए प्रयोग करते हुए "इस माह के व्यंग्य’ के अंतर्गत हमने महीने भर में प्रकाशित व्यंग्य रचनाओं में से कुछ चयनित रचनाओं पर बातचीत का निर्णय लिया है। आज के राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी भूमिका में आज अनेक व्यंग्यकार शोषित के स्थान पर शोषक का पक्ष लेते दिख रहे हैं।
व्यंग्यधारा गोष्ठी के संयोजक आलोचक डा. रमेश तिवारी (दिल्ली) ने सभी अतिथि प्रमुख वक्ताओं और गोष्ठी में सहभागी सभी सदस्यों का आभार प्रदर्शन करते हुए आश्वस्त किया कि यह समूह व्यंग्य विकास के लिए समर्पण भाव से इस तरह के आयोजन करता रहेगा।
तकनीकी मार्गदर्शन अरुण अर्णव खरे (बेंगलुरु) का रहा। कार्यक्रम में डा. कुंदन सिंह परिहार (जबलपुर), मधु आचार्य (बीकानेर), सुनील जैन राही (दिल्ली), डॉ. अजय जोशी,(बीकानेर) राजशेखर चौबे (रायपुर), डा. महेन्द्र सिंह ठाकुर ( रायपुर), अनूप शुक्ल (शाहजहांपुर), कुमार सुरेश (भोपाल), स्नेहलता पाठक (रायपुर ), वीना सिंह (लखनऊ) प्रभाशंकर उपाध्याय (सवाई माधोपुर), अल्का अग्रवाल सिग्तिया (मुंबई), रेणु देवपुरा (उदयपुर), राजेंद्र वर्मा (लखनऊ), मुकेश राठौड़ (भीकमगांव मप्र), एम एम चंद्रा (दिल्ली), विवेकरंजन श्रीवास्तव (जबलपुर), वीरेंद्र सरल (धमतरी), हनुमान प्रसाद मिश्र (अयोध्या), टीकाराम साहू (नागपुर), सौरभ तिवारी, वेदांत साव आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।
