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मां...


माँ 

तू ही नदिया 
सागर भी तू ही.
तू ही धरती
आकाश भी तू ही ।

तू ही बोली
मौन भी तू ही .
स्नेह ममता की
वाणी "माँ" तू ही ।

तू ही असीम, 
शून्य भी तू ही . 
कण - कण में समाया
विश्वात्मा, तू ही ।

स्नेह ममता
प्रेम और धीरज
आंचल तेरी
कोमल नीरज।।

तुझ बिन सुना
यह जग सारा
तेरी पूजा,
गौरव मेरा।।

- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर (महाराष्ट्र)
काव्य 6698410101263231550
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