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संस्कृति व अध्यात्म से कोरोना को हराना संभव : डॉ. विनय कुमार पाठक


नागपुर/पुणे। प्रकृति और ब्रम्हांड के भीतर पर्यावरण का महत्व अबाधित है। अत: भारतीय संस्कृति व अध्यात्म को अपनाने से कोरोना को हराना संभव है। ये विचार डॉ. विनय कुमार पाठक, पूर्व अध्यक्ष, राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़, रायपुर ने व्यक्त किये। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ. प्र., छत्तीसगढ़ इकाई द्वारा 'कोरोना एवं पर्यावरण का संबंध' पर विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय आभासी गोष्ठी में वे उद्बबोधन दे रहे थे।
      

गोष्ठी की अध्यक्षता संस्थान के अध्यक्ष प्राचार्य डॉ. शहाबुद्दीन नियाज़ मुहम्मद शेख, पुणे ने की। डॉ. पाठक ने आगे कहा कि, प्रकृति  जितना हमें देती है, उतना ही ग्रहण करना चाहिए। वर्तमान वैश्विक संकट कोविड महामारी प्रकृति की छेड़़छाड़ का परिणाम है। कोरोना काल मे प्रकृति प्रसन्न है, उसमे कोई प्रदूषण नहीं है। लेकिन हम सब सिकुड़ गये हैं।संक्रमण से बचाव के लिए हम परिवार के साथ घर मे प्रेम से रहे,जीवन की आपाधापी में सिर्फ  अर्थ के साथी न बने,नकारात्मकता से दूर रहकर अपनी सोच सकारात्मक रखें,अवसाद में ना रहे।सेवा भाव को अपनायें।
     

श्रीमती सुवर्णा जाधव , मुंबई ने कहा कि पूरा विश्व आज कोरोना की चपेट में है। परंतु कोरोना ने पर्यावरण को बचाए रखा है। क्योंकि आज नदी का जल स्वच्छ है, सड़कों पर वाहन
नहीं, कंपनियां बंद हैं।
       
प्राचार्य डॉ. हंसा शुक्ला,भिलाई ने कहा कि पेड़ पौधों का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। लेकिन प्रकृति के प्रति हमारी उदासीनता से विश्व कोरोना से ग्रस्त है। प्रकृति के दोहन से विकास के नाम पर हम विनाश के शिकार हो रहे हैं। परंतु कोरोना काल में निसंदेह प्राकृतिक  सौंदर्य मे वृद्धि हुई है।
       

डॉ. पूर्णिमा झेंडे,नासिक, महाराष्ट्र ने अपने मंतव्य मे कहा कि पर्यावरण संतुलन के लिए हमें बदलना होगा। अपनी नकारात्मक सोच व बुरी आदतें बदलते हुए संयमित जीवन व्यतीत करें। कोरोना काल मे पूर्णबंदी के भीतर प्रदूषण पचास प्रतिशत कम हुआ है।
   

प्रो. ललिता जोगड़,मुबंई ने कहा कि कोरोना ने समझदारी और साझेदारी का मंत्र दिया।क्योंकि यथार्थ मे पुरुषार्थ बनाये रखने में हमारी समझदारी हैं। अति से दूर रहते हुए धैर्य से काम करना चाहिए।
      

श्री ओमप्रकाश त्रिपाठी , सोनभद्र ने अपनी प्रस्तुति में कहा कि प्रकृति का नियम  ही है कि पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना। असंतुलन होने पर अनेक आपदाएं उपस्थित होती हैं । मानव द्वारा प्रकृति की छेड़़छाड़ करने से प्रकृति ने अपना विकराल  रूप दिखाया है। परंतु प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए योग, योगासन, प्राणायाम को अपनाने से पर्यावरण को संतुलित रखा जा सकता है।
   

डॉ. पूर्णिमा मालवीय, प्रयागराज ने कहा कि हमे कोरोना ने हमें पर्यावरण के मध्य रहना सिखाया है। क्योंकि जहां पर्यावरण असंतुलन दिखाई देगा। वहीं कोरोना अपना प्रकोप दिखायेगा।
      

अध्यक्षीय समापन में विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के अध्यक्ष प्राचार्य डॉ. शहाबुद्दीन नियाज़ मुहम्मद शेख, पुणे ने व्यक्त किया कि आज पूरा विश्व कोविड 19 की गिरफ्त में है। प्रकृति ने साबित किया है कि प्रकृति की विजय होती रहेगी। प्रकृति अजेय थी, अजेय है और अजेय रहेगी। जल,जंगल और जमीन के दोहन को रुकना चाहिए।
     

प्रारंभ मे विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के सचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार  द्विवेदी ने प्रस्तावना मे कहा कि कोरोना महामारी मे पर्यावरण से हमारा संबंध बढ़ गया है। इस  अवसर पर डॉ. मीरा सिंह फिलेडेल्फिया, अमेरिका ने पर्यावरण पर अपनी कविता प्रस्तुत की।श्रीमती मधु शंखधर,प्रयागराज ने संक्षेप मे विचार रखें।
        

गोष्ठी का आरंभ डॉ.ज्योति तिवारी, दिल्ली की सरस्वती वंदना प्रस्तुति से हुआ। स्वागत उद्बबोधन डॉ. रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने किया।
     

गोष्ठी का सफल संयोजन, संचालन करते हुए विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज की छत्तीसगढ़ इकाई की हिंदी सांसद डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक ने कहा कि सूरज की किरणें जब पड़ती है धरती पर तभी होता है सवेरा, पेड़ लगाओ धरती बचाओ तभी कर पाओगे इस पर बसेरा। व धन्यवाद ज्ञापन किया।
      

जूम पटल पर आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय आभासी गोष्ठी में मनीषा सिंह मुंबई, चंदन मित्रा,वीर अभिमन्यु सिंह ,डॉ. अनीता ठाकुर, डॉ. अनीता सिंह,पुष्पा श्रीवास्तव, श्री निवास कंडाला, प्रियंका महंत सहित अनेक विद्वान उपस्थित थे।

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