Loading...

स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्यकारों ने निभाई अहम भूमिका : डाॅ. रेश्मा अंसारी



नागपुर पुणे। स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेमचंद से लेकर कृष्णा सोबती तक के अनेक साहित्यकारों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। इस आशय का प्रतिपादन मैट्स विश्वविद्यालय,रायपूर, छत्तीसगढ के हिंदी विभाग की अध्यक्ष डाॅ. रेश्मा अंसारी ने किया।

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तरप्रदेश के तत्वावधान में 'स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्यकार' विषय पर आयोजित 72 वीं राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी में वे मुख्य अतिथि के रूप में अपना मंतव्य दे रही थी।

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ. प्र. के अध्यक्ष प्राचार्य डाॅ.शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख पुणे, महाराष्ट्र ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। 

डाॅ. रेश्मा ने आगे कहा कि दो सौ वर्षों की अंग्रेजी हुकुमत की गुलामी से देश को पूरी तरह आजाद कराने में देश के अनेक महापुरूषों, वीर सपूतों और स्वतंत्रता सेनानियों की अहम भूमिका रही है, जिनमें साहित्यकारों की महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। 

प्रेमचंद की 'रंगभूमि',' कर्मभूमि' उपन्यास हो या भारतेन्दू  हरिश्चंद्र का 'भारत दुर्दशा' नाटक या जयशंकर प्रसाद का 'चंद्रगुप्त' सभी देशप्रेम की भावना से भरा पडा है। 

शासकीय माता कर्मा कन्या महाविद्यालय, रायपुर, छ. ग. की हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. सरस्वती वर्मा ने कहा कि आजादी के आंदोलन में साहित्यकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों में नया जोश, देश के प्रति प्रेम और आजादी के लिए मर मिटने वाली रचनाएँ की। अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीयों, क्रांतिकारियों का मनोबल बढाया।
        
डाॅ.अण्णासाहेब बेंडाळे महाविद्यालय जलगाँव, महाराष्ट्र की हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. रूपाली दिलीप चौधरी ने कहा कि, साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सच्चाई ही नहीं,बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सच्चाई है।
       
डाॅ. मधु शंखधर 'स्वतंत्र' प्रयागराज, उ. प्र. ने कहा कि बंकिमचंद्र ने 'आनंदमठ' व 'वंदे मातरम्' की रचना की। वंदेमातरम् राष्ट्रगीत ने तत्कालीन स्वतंत्रता आंदोलन में देश के सभी देशवासियों को एकसूत्र में पिरो दिया था।
       
डाॅ. रश्मि संजय श्रीवास्तव,लखनऊ ने कहा कि 15अगस्त का शुभ दिन भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसी दिन हमारी सघन कलुष - कालिमामयी दासता की लौह शृंखला टूटी थी।
       
डाॅ.रंजित कुमार, बैंगलुरू, कर्नाटक ने कहा कि दिनकर जी के काव्य में राष्ट्रीय चेतना की भावना कूटकूट कर भरी हुई है। वे हमेशा राष्ट्रगीत के गायक रहे हैं।उनके काव्य का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र का उन्नयन और सामाजिक प्रगति की संकल्पना है।
        
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के सचिव डाॅ. गोकुलेश्वरकुमार द्विवेदी ने प्रास्तविक  भाषण में कहा कि अंग्रेजों को भगाने में देश के क्रांतिकारियों व साहित्यकारों का बहुत बडा योगदान है।
             
गोष्ठी के अध्यक्ष प्राचार्य डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने अध्यक्षीय समापन में कहा कि,आजादी के आंदोलन के इस महायज्ञ में विभिन्न भाषा - भाषी साहित्यकारों ने तत्कालीन समाज में चेतना के ऐसे बीज बोये थे,परिणाम स्वरूप समाज का हर वर्ग आजादी के आंदोलन में खडा हुआ।
        
गोष्ठी का शुभारंभ डाॅ. मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, छ. ग. द्वारा प्रस्तुत स्क्रीन के सरस्वती वंदना से हुआ। तत्पश्चात उन्होंने राष्ट्रीय भावना से ओत - प्रोत दो गीत स्क्रीन द्वारा प्रस्तुत किये।प्रा.रोहिणी डावरे, अकोला, महाराष्ट्र ने स्वागत भाषण दिया। 

गोष्ठी का मंच संचालन व नियंत्रण विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान,प्रयागराज उ.प्र. के छत्तीसगढ इकाई की हिंदी सांसद डाॅ. मुक्ता कान्हा कौशिक रायपुर, छ. ग. ने किया तथा डाॅ. अनसूया अग्रवाल,महासमुंद, छ. ग. ने आभार ज्ञापन किया।
       
उक्त संगोष्ठी में पुष्पा श्रीवास्तव 'शैली', लक्ष्मीकांत वैष्णव, छ. ग., डाॅ.रश्मि चौबे, गाजियाबाद, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डाॅ. नागनाथ भेंडे, कर्नाटक, डाॅ. भरत शेणकर अकोले,महाराष्ट्र सहित अनेकों की उपस्थिति रही।
साहित्य 1329002945597039288
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list