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परसाई के लेखन में अपने समय को देखा जा सकता है : डा. प्रेम जनमेजय


नागपुर। हरिशंकर परसाई ने समय से मुठभेड़ की और सवाल भी उठाए। परसाई के लेखन में अपने समय को देखा जा सकता है। अगर हम इस दृष्टिकोण से लिखेंगे तो हमारी दृष्टि भी व्यापक होगी। परसाई को अपनाएं, पर उनकी कार्बन कापी न बनें। यह कहना है वरिष्ठ व्यंग्यकार व व्यंग्ययात्रा के संपादक डॉ. प्रेम जनमेजय (नई दिल्ली) का।

हरिशंकर परसाई जी को स्मरण को करते हुए उनकी रचनात्मकता को केंद्र में रखते हुए व्यंग्यधारा समूह की ओर से रविवार को ‘आज का समय और परसाई’ विषय पर ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें बतौर अतिथि वक्ता डॉ. प्रेम जनमेजय(दिल्ली), पद्मश्री डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी (भोपाल) और व्यंग्य आलोचक श्री सुभाष चंदर (नई दिल्ली) शामिल थे।

डॉ. प्रेम जनमेजय ने विषय पर बात करते हुए कहा कि जीवन में समय, दुख, प्रेम और त्रासदी मनुष्य के शाश्वत साथी हैं । बकौल चार्ली चैपलिन जिंदगी पास से देखने से त्रासदी है, किंतु दूर से देखने में कॉमेडी लगती है। यही स्थिति व्यंग्य की है| सुशिक्षित मस्तिष्क ही अच्छा व्यंग्य देख सकता है । समय वही है, विरोधी दल और सत्ता दल का समय अलग है। समय को पढ़ने और समझने की जरूरत होती है । परसाई के लेखन के शुरू में उनके सामने मोहभंग का समय था। उन्होंने मोहभंग से लड़ने का जज्बा पैदा किया और व्यंग्य का हथियार उठाया। नए व्यंग्य लेखकों को यदि कुछ नया लिखना और सीखना है तो परसाई के संग्रह ‘सदाचार का ताबीज’ की भूमिका जरूर पढ़नी चाहिए।

परसाई  के वैचारिक दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए डॉ जनमेजय ने कहा कि प्रारंभ में परसाई जी समाजवादी सोच रखते थे। वह मुक्तिबोध की ‘’अंधेरा’’ कविता का काल था। परसाई ने नौकरी छोड़ दी थी। उन्होंने  ‘’प्रहरी’’ पत्रिका निकाली और एक कार्यकर्ता जैसा जीवन जीते थे। हमारे समय में ट्विटर, व्हाट्सएप आ गया है लेकिन उस समय नहीं था। हमारे समय को देखने का दृष्टिकोण क्या हो, इस पर विचार करने की जरूरत है। पहला दृष्टिकोण यह है कि किनारे पर बैठे हैं, लहरें देख रहे हैं, बोट राइडिंग कर रहे हैं और दूसरा दृष्टिकोण यह है कि गोताखोर बन जाएं। परसाई के समाजशास्त्रीय विचारों को पढ़िए, उनके निबंध पढ़िए तो उनकी दृष्टि को समझ सकेंगे । हमारा समय बता रहा है कि कैसे कोरोना काल में सब कुछ विपरीत स्थितियां हुई और मानवीय संबंध तक बदल गए । इन अर्थों में हमारा समय परसाई से भिन्न है।

पद्मश्री वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि परसाई अपने लेखन में समय के प्रति ईमानदार थे, इसलिए आज भी प्रासंगिक हैं। हर बड़ी रचना का महत्व होता है। जब तक किसी रचना के  पुनर्पाठ में हम नया नहीं पाते, तब तक वह रचना बड़ी नहीं होती। परसाई की रचना को जितनी बार पढेंगे अथवा उस पर विमर्श करेंगे तो हर बार कुछ नया पाएंगे, कुछ नया सीखेंगे। हम सोचें कि आखिर परसाई की रचना में ऐसा क्या है ? परसाई  गरीब और वंचितों के लेखक थे। जहाँ तक समय की बात है तो आज भी परसाई का समय है। कालिदास, वाल्मीकि, तुलसी, प्रेमचंद, मार्क्स, समरसोट मॉम, मार्खेज और परसाई शाश्वत लेखक हैं। वे आज भी प्रासंगिक हैं और सौ साल भी बाद भी रहेंगे, चाहे समय कितना ही बदल जाए। परसाई ने दृष्टि देने का काम किया। बेईमानी करके कोई शाश्वत कैसे हो सकता हैं? महत्व इस बात का है कि हम लेखन में अपने पलों के प्रति ईमानदार हैं कि नहीं, हम आँखे खोलकर देखते हैं कि नहीं। कवि नरेश सक्सेना की ‘नदी’ कविता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वे इसमें  नदी को पुल पर से नहीं देखने, बल्कि उसमें उतरकर देखने की बात करते हैं।उसकी गहराई में जाने की बात करते हैं।यही बात परसाई के लेखन में दिखाई देती है। 

डॉ चतुर्वेदी ने कहा कि परसाईं से सम्बंधित संस्मरणकारों ने अपने संस्मरणों में स्वयं को महान सिद्ध करने में की कमी नहीं छोड़ी और परसाई से ही गवाही दिलवाई और उन पंक्तियो को टैग लाइन बनाकर प्रचारित किया। आज भी राजनीति, समाज,प्रशासन की बदमाशियां, सत्ता का खेल  वही है, जिसे परसाई ने समझा था। वे षड्यंत्र आज भी हैं। अगर जी रहे पलों के प्रति ईमानदार होंगे तो समय के प्रति भी ईमानदार होंगे। हम देखते हैं कि गरीबी, सत्ता की चाह, दुरभिसंधियां वही हैं। सबसे बड़ा प्रश्न कि परसाई का लेखन बासी और उबाऊ क्यों नहीं हुआ ? आम पाठक और व्यंग्य में हमारी युवा पीढ़ी देख रही है कि परसाईं की रचना में आज भी ताजगी है। उन्होंने गाँधी, मार्क्स और चेखव को पढ़ा, उनसे सीखा जिससे उनकी दृष्टि बनी। उन्हें केवल मार्क्सवादी कह देना उनके साथ न्याय करना नहीं है, बल्कि वे मानवतावादी थे। पूंजी  के खेल को समझते थे। आवश्यकता है परसाई की दृष्टि को समझा और उनकी संवेदना को पहचाना जाए। सत्ता का हिस्सा बनने की ललक नहीं थी। उनमें सत्ता की कारगुजारियों की गहरी समझ थी। आज के व्यंग्य लेखक को उसी गहराई में जाकर समझना होगा । ओछी गणितों से बाहर निकलने पर ही कोई परसाई बन सकता है । लेखन करियर नहीं है। करियर के लिए समझौता करना पड़ता है। लेखन जज्बा है, मुमुक्षा और तड़प है, यह कोई धंधा नहीं है। किसी में इतना साहस हो तब कोई परसाई की छाया को छू सकता है।

व्यंग्य विमर्श का आरंभ करते हुए वरिष्ठ व्यंग्यकार और आलोचक श्री सुभाष चंदर ने कहा कि परसाई रचनाओं के माध्यम से सामाजिक सरोकारों, जनोन्मुखता, आम आदमी के संघर्षों में साथ खड़े दिखाई देते हैं। वे जनोन्मुख दृष्टि से यह भी देखते थे कि व्यंग्य का हथियार कहीं गरीब और दबे कुचले वर्ग के विपरीत नहीं चला जाए। परसाई अपनी जनोन्मुखता के कारण याद किए जाते हैं। उन्होंने राजनीति, धर्म, सामाजिक पाखण्ड पर निर्ममता से  प्रहार किए हैं। प्रसिद्ध विद्वान श्यामसुंदर मिश्र की मानें तो परसाई अपनी जनपक्षधरता, प्रगतिशील और सुविचारित दृष्टि भरे लेखन के कारण विश्व के चार प्रमुख लेखकों में शुमार किए जाते हैं। परसाईं  पर साम्यवादी होने का ठप्पा लगता है लेकिन उन्होंने साम्यवादियों के छल-छद्म के खिलाफ भी खूब लिखा।

व्यंग्य विमर्श के शुरुआत में वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री रमेश सैनी (जबलपुर) ने अपनी भूमिका में विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि आज लोग अपने को बचाकर लिख रहे हैं, लेकिन परसाई ने सभी पर बेबाक लिखा। आम आदमी की आवाज बुलंद करने के लिए वे सड़क पर भी उतरे। दंगाइयों को समझाइश दी। आज ढलुआ साहित्य लिखा जा रहा है। जैसे हमें ढाल दिया गया, उसमें से ही चीजें निकल कर आ रही है, जिसमें परिवर्तन की अनुगूंज नहीं है।

प्रखर व्यंग्य आलोचक डॉ रमेश तिवारी (नई दिल्ली) ने अपने उद्बबोधन में परसाई के लेखकीय सरोकार को रेखांकित करते हुए कहा कि आज हमारे सामने समाज के उपेक्षित और वंचितों के साथ खड़े होने की कसौटी है। यह देखने की जरूरत है कि आम आदमी की पीड़ा की अभिव्यक्ति हो रही है या नहीं। परसाई ने जनपक्षधरता के साथ नियामक संस्थाओं के समक्ष सवाल उठाए। इन कारणों से परसाई अपने समय का अतिक्रमण करते हुए हमेशा जनमानस में मौजूद रहेंगे|

वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री राजेन्द्र वर्मा (लखनऊ) ने परसाई को पथ प्रदर्शक बताते हुए कहा कि उन्हें पढ़े बिना व्यंग्य को नहीं समझ सकते। आज अखबारी लेखन में न सरोकार है न व्यंग्य।
संगोष्ठी की प्रस्तावना व संचालन श्री रमेश सैनी तथा आभार प्रदर्शन डॉ. रमेश तिवारी ने किया।

संगोष्ठी में सर्वश्री ईश्वर शर्मा (इंदौर), फारुख आफरीदी (जयपुर), जगदीश ज्वलंत, निर्मल गुप्त,  कमलेश पांडेय (नई दिल्ली), संतोष खरे (सतना) सेवाराम त्रिपाठी (रीवा) बुलाकी शर्मा (बीकानेर), प्रभात गोस्वामी (जयपुर) सुधीर कुमार चौधरी (इंदौर),  अनूप शुक्ला (शाहजहांपुर) कुमार सुरेश (भोपाल),  राजशेखर चौबे (रायपुर), शांतिलाल जैन (उज्जैन) सुनील जैन राही (दिल्ली) श्रीमती अल्का अग्रवाल सिगतिया (मुम्बई), श्रीमती रेणु देवपुरा (उदयपुर), सूर्यदेव कुशवाहा, डाँ. महेंद्र कुमार ठाकुर (रायपुर) के पी. सक्सेना 'दूसरे' (रायपुर) अभिजित कुमार दूबे (अगरतला.) सुरेश कुमार मिश्र 'उरतृप्त',(हैदराबाद), टीकाराम साहू (नागपुर)  मुकेश राठौड़ (भीकमगाँव म प्र), राकेश सोहम (जबलपुर)  जयप्रकाश पाण्डेय (जबलपुर) विवेक रंजन श्रीवास्तव (जबलपुर), आत्माराम भाटी (बीकानेर), ब्रजेश कानूनगो (इंदौर), रामस्वरूप दीक्षित (टीकमगढ़) सौरभ तिवारी, (दिल्ली) आदि की उपस्थित उल्लेखनीय रही|

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