साहित्य की मूल्यवत्ता के मानदंड हैं सामाजिक सरोकार : प्रो. सुधीर सिंह
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नागपुर। जो साहित्य अपने समय की मानवीय चिंताओं को जितनी गहराई से अंकित करता है, वह उतना ही महान और महत्वपूर्ण होता है। हमारे साहित्य का भक्तिकाल और छायावाद काल अपनी सामाजिक सम्बद्धता के कारण ही प्रासंगिक है। यह बात युवा आलोचक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में कही।
व्याख्यान का विषय था - आधुनिक हिन्दी कविता के विविध स्वर। उन्होंने कहा कि आधुनिक कविता अपने समय की स्थितियों का बयान है। छायावाद में स्वाधीनता संग्राम के दौर की इस राष्ट्रीय सामाजिक आकांक्षा की अभिव्यक्ति हुई है कि शक्ति का मौलिक संधान करने की जरूरत है। छायावादी कविता आधुनिक हिन्दी कविता की आधारभूमि है। भाव, भाषा, विषय को लेकर जितने बहुविध प्रयोग यहां हुए हैं, उतने अन्यत्र दुर्लभ हैं।
दूसरे अतिथि वक्ता प्रख्यात आलोचक, पं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने आधुनिक हिन्दी कविता को संक्रांति काल की कविता बताते हुए कहा कि आधुनिक कवियों ने समाज की चिताओं, मनोवृत्तियों को ही नहीं वर्णित किया बल्कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध नवजागृति का संदेश भी दिया।
भारतेन्दु और उनका मंडल राष्ट्रोत्थान के लिए जन- जागृति को अपना धर्म मानता था। उसका कवि - कर्म सामाजिक दायित्व बोध का परिचायक है। इन कवियों ने अपने समय की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया। वास्तव में आधुनिक हिन्दी कविता भारतीय जनभावना की वाणी है। आधुनिक काल में ही साहित्य पहली बार इतनी गहराई से जन-सरोकारों से जुड़ता है।
प्रास्ताविक रखते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि हर दौर का साहित्य अपने समय की अनुगूंज होता है। आधुनिक हिन्दी कविता के कई रूप और 'शेड्स' हैं, जो जीवन - वैविध्य के सूचक हैं। जीवन से गहरे जुड़ाव की अनुभूति समूची आधुनिक हिन्दी कविता में विद्यमान है।
आनलाइन आयोजित इस कार्यक्रम में देश के अनेक हिस्सों से प्रतिभागी जुड़े थे। वक्ताओं ने प्रतिभागियों के प्रश्नों के सार्थक समाधान भी किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ सुमित सिंह ने किया तथा आभार प्रदर्शन डॉ संतोष गिरहे ने व्यक्त किया।
