सामाजिक समरसता के प्रवर्तक थे संत तुलसीदास : प्रो. शुक्ल
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नागपुर। तुलसीदास सामाजिक समरसता के प्रवर्तक थे। उन्होंने समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का संदेश दिया। समाज का समुन्नत विकास तब तक संभव नहीं है, जब तक सामाजिक सामंजस्य न स्थापित किया जाय। यह बात संत साहित्य के विद्वान, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के पूर्व आचार्य प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल ने कही। वे तुलसी जयंती के उपलक्ष्य में हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे। व्याख्यान का विषय था-'तुलसीदास : कल और आज'।
प्रो.शुक्ल ने तुलसी साहित्य की विवेचना करते हुए यह कहा कि तुलसी लोकमानस के कवि थे। उन्होंने रामकथा के माध्यम से लोक का आदर्श प्रस्तुत किया।जब तक लोकजीवन में विसंगतियां व्याप्त रहेंगी तब तक तुलसीदास की प्रासंगिकता बनी रहेगी। लोक को लोभ से ,शोक से, भय से, ईर्ष्या से मुक्ति का मार्ग दिखाता है तुलसी साहित्य। आज के समाज में जो विसंगतियां हैं, उनके समाधान के लिए तुलसीदास जैसे संतों के जीवन-दर्शन को समझने की जरूरत है।
प्रास्ताविक रखते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने तुलसीदास को भारतीय चिंतन परम्परा का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि तुलसी साहित्य में समग्र मानव कल्याण का भाव निहित है। तुलसीदास का साहित्य केवल श्रद्धा की वस्तु नहीं है,वह मानव समाज का दिशा-दर्शक है। रामकथा के माध्यम से उन्होंने अपने समय -कलिकाल - की समस्याओं पर प्रकाश डाला है।
विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए राजकुमार केवलरमानी महाविद्यालय की प्रोफेसर गीता सिंह ने तुलसीदास की नारी विषयक दृष्टि को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि तुलसी नारी मनोविज्ञान के पारखी थे। नारी जीवन की दशा-दुर्दशा पर उन्होंने आवाज उठाई। तुलसी साहित्य वर्तमान स्त्री- विमर्श के लिए भी दिशा-दर्शक है।
दूसरे विशिष्ट वक्ता पोरवाल महाविद्यालय के डॉ.विकास कामडी ने तुलसीदास की समन्वयवादी दृष्टि पर विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तुलसी समाज में समन्वय के पक्षधर थे। समन्वयशील समाज ही विकासशील समाज होता है। आनलाइन आयोजित इस कार्यक्रम में देश-भर से अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी जुड़े और प्रश्नों-प्रतिक्रियाओं के माध्यम से अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ सुमित सिंह ने और आभार प्रदर्शन डॉ संतोष गिरहे ने व्यक्त किया।
