हिंदी हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है : प्रा. डॉ. शेख साबेर
14 सितंबर हिंदी दिवस पर विशेष लेख
हम सभी जानते हैं कि भारत में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियाँ बोली जाती हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत में सबसे बड़ा प्रश्न राष्ट्रभाषा को लेकर था। 6 दिसंबर 1946 को संविधान निर्मिति के लिए भारत की संविधान सभा का चुनाव किया गया था। 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की अनुच्छेद 343 (1) में इस प्रकार वर्णित है, संघ की राष्ट्रभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संविधान के अंतिम प्रारूप को 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अनुमोदित किया गया था और यह 26 जनवरी, 1950 से पूरे देश में लागू हुआ।
हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई थी। इसी के चलते हर साल 14 सितंबर से 21 सितंबर तक, हिंदी दिवस के अवसर पर राजभाषा सप्ताह या हिंदी सप्ताह मनाया जाता है। इस सप्ताह में विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। वास्तव में विद्यालय, महाविद्यालय और कार्यालयों में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसका मूल उद्देश्य केवल हिंदी दिवस तक इसे सीमित न करके लोगों के बीच हिंदी भाषा के विकास की भावना को बढ़ाना है। इन सात दिनों के दौरान लोगों को हिंदी की अन्य गतिविधियों के माध्यम से हिंदी भाषा के विकास और उपयोग के लाभों के बारे में समझाया जाता है।
हिंदी के प्रति लोगों को प्रेरित करने के लिए हिंदी दिवस पर भाषा सम्मान शुरू किया गया है। यह सम्मान देश के ऐसे व्यक्तित्व को प्रतिवर्ष दिया जाता है, जिन्होंने लोगों के बीच हिंदी भाषा के उपयोग और उत्थान में विशेष योगदान दिया है। यह सम्मान विशेष लेखकों को भारतीय भाषाओं में उल्लेखनीय योगदान के लिए और शास्त्रीय और मध्यकालीन साहित्य में योगदान के लिए प्रतिवर्ष दिया जाता है। इसलिए, हिंदी भाषा के बारे में जागरूकता और महत्व का प्रसार करने के लिए 14 सितंबर को पूरे देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है। आज भारत में हिंदी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। देश के लगभग 70 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते और समझते हैं।
हिंदी के बारे में सबसे दिलचस्प सच्चाई यह है कि "हिंदी" मूल रूप से एक फारसी भाषा का शब्द है और पहली हिंदी कविता प्रख्यात कवि "अमीर खुसरो" द्वारा लिखी गई थी। हिंदी खडी बोली के प्रणेता आदि कवि अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद उर्फ अमीर खुसरो की हिंदी रचनाओं में देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीयता का स्वर उँचे तेवर में दिखाई देता है। उन्हें अपनी मातृभूमि भारत और हिंदी पर गर्व था। उन्होने जगह-जगह पर देशप्रेम और हिन्दवी भाषा का उल्लेख किया है। वे एक स्थान पर कहते हैं, ‘‘मैं हिंदुस्तानी की तूती हूँ। अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो, तो हिंदवी में पूछो, मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति पूर्व 1918 में, हिंदी साहित्य सम्मेलन में, महात्मा गांधी ने पहली बार हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की बात की। महात्मा गांधीजी ने हिंदी को जनमानस की भाषा भी कहा था। गांधीजी ने हिंदी के उत्थान का बिगुल फूंका था। उनका मानना था कि पूरे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने की संजीवनी देने में समर्थ हैं तो केवल हमारी मातृ भाषा हिंदी ही है। हिंदी भाषा हमारी एकता व भाईचारगी की मिसाल है। हिंदी में ही देश को एक सूत्र में बांधे रखने की क्षमता है।
हिंदी देश की एकता का मंत्र है। आजादी की लड़ाई में भी हिंदी की भूमिका अहम रही है। आजादी के समय से ही हिंदी की शक्ति को समझा गया। आजादी के समय महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, रविंद्रनाथ टैगोर, बाल गंगाधर तिलक, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य और लाला लाजपत राय जैसे महापुरुषों एवं साहित्यकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी, काका कालेलकर मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, दिनकर, सेठ गोविंददास जैसे आधी लेखक व कवियों ने भी हिंदी के महत्व को बनाया है वर्तमान युग के लेखकों और कवियों ने भी हिंदी को विशिष्ट पहचान दिलाई है। एक समय था महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, महात्मा गांधी , स्वामी दयानंद,जैसे महापुरुषों ने मुख्य भाषा हिंदी न होने के बावजूद देश में जन जागरण लाने के लिए हिंदी का ही प्रयोग उचित समझा था।
आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने वालो में मैथिलीशरण गुप्त, काका कालेलकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर राजेंद्र सिंह ने अथक प्रयास किए थे। इसके साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी जी भारत के पहले विदेशमंत्री है, जिन्होने न्यूयार्क में संयुक्त संघ के ३२ वे अधिवेशन में हमारी मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा हिंदी में भाषण देकर इतिहास रचा। 04 अक्टूबर, 1977 का वह दिन आज भी इतिहास के पन्नों पर सुवर्ण अक्षरों में दर्ज है। भारत के विदेश मंत्री के रूप में राष्ट्र संघ के अधिवेशन में राष्ट्रभाषा हिंदी में दिए गए भाषण के बाद ‘गूँजी हिन्दी विश्व में’ इस कुण्डलियो की रचना की थी। वह इस प्रकार है-
‘‘गूँजी हिन्दी विश्व में
स्वप्न हुआ साकार;
राष्ट्र संघ के मंच से,
हिन्दी का जयकार;
हिन्दी का जयकार,
हिन्दी हिन्दी में बोला;
देख स्वभाषा-प्रेम
विश्व अचरज से डोला।’’
अटल जी राष्ट्रभाषा हिंदी प्रेमी रहे है। जब भी उनसे उनके जीवन के सुखद क्षण के विषय में पूछा जाता है तो वे कहते- ‘‘अभी आना बाकी है। अभी तो संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा में हिंदी में भाषण देना है।’’ जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ में बोलने का मौका मिलता वे हिंदी में ही बोलते। फिर से विश्व मंच पर हिंदी की गूँज नवम्बर 19187 में अटल जी संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में भाग लेने भारतीय प्रतिनिधि मंडल के साथ गए। 8 नवम्बर को उन्होने पुन: राष्ट्रभाषा हिंदी में भाषण दिया और राष्ट्रभाषा हिंदी को फिर से विश्व मंच से गौरवान्वित किया।
वर्तमान में, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिंदी अच्छी तरह से जानी जाती है और अच्छी तरह से बोली ती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी को अग्रणी किया और उनके बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक आदान-प्रदान में तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में बात करना पसंद करते हैं। क्योंकि हिंदी पुरखों की संस्कृति के संवर्धन के लिए अर्पण- तर्पण का एक आग्रह भी है। इसलिए हिंदी हमारी आन बान शान है, हिंदी हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है।
हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं !
- प्रा.डॉ.शेख साबेर शेख कदीर
हिंदी विभागाध्यक, नॅशनल कला विज्ञान महाविद्यालय पलसखेड़ा, ता. सोयेगाव जिला. औरंगाबाद (महाराष्ट्र)
ईमेल sabersir5@gmail.com
