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कविता मानव जीवन का प्राण है : डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी



नागपुर/पुणे। कविता मनुष्य के जन जीवन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विधा है। अतः निस्संदेह कविता मानव जीवन का प्राण है। ये विचार विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के सचिव डॉ गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने व्यक्त किये। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में हिंदी पखवाड़ा के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी कवि सम्मेलन में वे उद्बोधन दे रहे थे। डॉ द्विवेदी ने आगे कहा कि आधुनिक युग में कविता मानव मन का मनोरंजन के साथ मस्तिष्क की क्षुधा व तृष्णा मिटाने का भी महनीय कार्य करती है। 

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में कविता का उभरता व विकसित रूप वर्तमान में मन को संतुष्टि प्रदान करता है। कविता विधा के क्षेत्र में दिनों दिन कवि गण, उसके पाठकों और श्रोताओं की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।
आज के कवि सम्मेलन में हिंदी से तथा अन्य विषयों से संबंधित जो कवितायें प्रस्तुत की गई वे अत्यंत रोचक, मधुर व बोधक  रही।
इस कवि सम्मेलन में अनेक कवि कवयित्रियों द्वारा अपनी कविताएं प्रस्तुत की गई।

पुष्पलता श्रीवास्तव शैली, रायबरेली, उत्तर प्रदेश अपनी रचना में कहती है -
बड़ी पावन सुहावन मधु मलय
सी हिंदी ही तो है।
रश्मि लहर, लखनऊ कहती-है 
निखरेगी नव श्रृंगार किये,
पथ पर ना कोई बाधा है
अब विश्व पटल पर चमकेगी 
हिंदी अपना वादा है।
 डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश ने सुनाया - 
 हिंदी तुम मेरे ज्ञान का आधार हो, हिंदी तुम सुगंधित बयार हो।

डॉ सुनीता प्रेम यादव,औरंगाबाद, महाराष्ट्र ने कहा- 
किरण बुहारे पथ तेरा,  सूरज का चमका गिरा। तू भी अपनी चमक दिखा अंधकार को दूर भगा।।
प्राध्यापिका रोहिणी डावरे, अकोले, महाराष्ट्र ने अपनी  प्रस्तुति में कहा -
अनमोल विचार और संस्कृति संस्कार के चमकीले मोति, भारत के जन मन तक पहुंचाती जान से प्यारी हिंदी।
डॉ रुपाली चौधरी, जलगांव, महाराष्ट्र से कहती है -
आओ मिलकर हिंदी का दीप जलाएं, आओ मिलकर हिंदी का परचम लहराए।

डॉ.सुधा सिन्हा,पटना, बिहार की प्रस्तुति-
 देश का झंडा नहीं झुक सकता है किसी वार से,
कोई भी आ के डरा  सकता नहीं तलवार से।
उषा श्रीवास्तव, मुजफ्फरपुर, बिहार ने सुनाया- 
सबसे सुंदर हिंदी भाषा 
हिंदुस्तान की शान है।
विदेशों में भी बोली जाती,
अपनी हिंदी महान हैं।
प्रा. मधु शंखधर 'स्वतंत्र' ने कहा-
संविधान ने माना हमको, 
सहज सुरक्षित मान दिया।
मातृरूप में जानी जाऊं,
ऐसा शुभ वरदान दिया।

डॉ. पूर्णिमा मालवीय, प्रयागराज ने अपनी कविता में कहा-
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा, हिंदी को मैं
राष्ट्रभाषा मानती हूं। उसी के पग चिन्ह पर चलकर धरा को जानती हूं।
प्रो. डॉ अरुणा राजेंद्र शुक्ल नांदेड़, महाराष्ट्र अपनी 'एकता' कविता में कहती है,' अजब गजब खेल तमाशा ये रचा है, जहां देखो वहां तूफान मचा है।'

डॉ, मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, छत्तीसगढ़  की प्रस्तुति थी-
आओ मिलकर हिंदी का गुणगान करें,
केवल आज नहीं हर बार करें।
डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, पटना बिहार लिखती हैं -  हिंदी बनेगी राष्ट्रभाषा,
आओ ले कसम।
काव्य पाठ का शुभारंभ डॉ सुनीता यादव, औरंगाबाद द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से  हुआ।
प्रा.रोहिणी डावरे ने स्वागत भाषण दिया।
संयोजन एवं संचालन का दायित्व डॉ. मुक्ता कान्हा, रायपुर, छत्तीसगढ़ ने निभाया तथा रश्मि चौबे ने आभार ज्ञापन किया।
साहित्य 1541599047741616236
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