अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँच चुकी है हिंदी : डॉ. शहाबुद्दीन शेख
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नागपुर पुणे। संविधान सम्मत देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निःसन्देह पहुँच चुकी है। यह प्रतिपादन विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ.प्र. के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने किया।
देश की प्रतिष्ठित संस्था विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ.प्र.के तत्वाधान में "जन-जन की भाषा" विषय पर 'बाल संसद आभासी राष्ट्रीय गोष्ठी में वे बोल रहे थे। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में अद्विका जायसवाल उपस्थित थीं तथा कु. मानसी शर्मा भोपाल, ने गोष्ठी की अध्यक्षता की।
डॉ. शहाबुद्दीन शेख ने आगे कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने 1918 में ही हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया था।
हिंदी एक सरल, सुगम व मधुर भाषा है। ओम प्रकाश त्रिपाठी, सोनभद्र ने कहा कि कोई भी भाषा कमज़ोर नही होती, परंतु सबसे महत्वपूर्ण भाषा उसकी अपनी माँ की होती है। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज ने हिंदी को पूरी निष्ठा के साथ उत्कर्ष पर पहुंचाने का कार्य किया है।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के सचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने अपने आशिर्वचन में कहा कि भाषाएँ कितनी भी सीखें परंतु मातृभाषा व राष्ट्रभाषा की उपेक्षा न करें। अपनी भाषा में काम करना बहुत सरल व उत्तम होता है। भाषा और संस्कृति से आत्मिक विकास होता है। डॉ. सुनीता यादव,औरंगाबाद ने कहा है कि बच्चों को देखते की ममता उमड़ आती है और अपनी कविता मे कहा-"मैं दीप जलाने आई हूँ "। श्रीमती पूर्णिमा कौशिक, रायपुर ने कहा है कि बच्चे घर से ही अपनी मातृभाषा बोलने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। बालसंसद प्रभारी डॉ. रश्मि चौबे ने कहा है कि - अपनी भाषा ही हमे उन्नति का मार्ग दिखाती है।
बाल संसद का शुभारंभ कु.जिया खान,पुणे,महाराष्ट्र की सरस्वति वंदना से हुआ।मंच संचालन कु.अवनी तिवारी, इंदौर ने किया।
कु. अश्लेषा चक्रवर्ती,राजनंदगांव ने कहा - हिंदी मेरा ईमान है, हिंदी हमारी पहचान है। प्रतिमा जैन ने कहा कि हिंदी समझने में आसान है, जो विश्व को जोड़ने मे समर्थ है। माँ को मॉम और पिता को डैड बनाना ठीक नहीं है।
समृद्धि सिंह ने कहा कि विभिन्न धर्म, परंपरा और संस्कृति से युक्त भारत देश विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है।
कु. पूर्विका सिंह ने कहा है कि - "वैसे तो हर वर्ष बजता है नगाड़ा, नाम है जिसका हिन्दी पखवाड़ा"।
कु. अद्विका जासवाल ने कविता सुनाई - "अंग्रेजी हमे सीखनी चाहिए पर हिंदी को गिरा कर नहीं।"
मनीष बर्मन ने सुनाया - 'मैं मुसाफिर बनकर आया था। मुसाफिर बनकर जाऊँगा।' रितिमा सिंह ठाकुर ने गाया- 'तरूवर फल नहीं खाते', राहुल बर्मन ने गाया- जिंदगी एक जादू की छड़ी है, कभी यह खुशी लाती है, कभी गम। आद्य तिवारी ने कविता सुनाई- हिंदी से सब कुछ सीखा है। कु. स्वरा त्रिपाठी ने भी अपनी कविता सुनाई।
बालसंसद में कुमारी दिपिका, कोरबा, नंदिनी, दुर्ग, समृद्धि सिंह, श्रेया साहू, कोरबा,छ.ग., आद्य तिवारी, रायपुर के सिवा श्रीमती दीप्ति शर्मा, ज्योति तिवारी एवं पुष्पा की उपस्थिति रही। डाॅ.रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने सभी का आभार ज्ञापित किया।
