सामाजिक अंत:सूत्रता का मापक है साहित्य : प्रो. शम्भूनाथ
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नागपुर। साहित्य सामाजिक अंत:सूत्रता का मापक होता है। साहित्य का इतिहास अतीत का लेखा-जोखा ही नहीं है, बल्कि वर्तमान के निर्माण की बुनियाद है। विकास का कोई भी अध्याय बिना बुनियाद के नहीं ठहर सकता। यह बात अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के प्रोफेसर शम्भू नाथ तिवारी ने हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में कही।
साहित्य के इतिहास लेखन पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी समाज का साहित्य उसकी सामाजिक प्रगति का गवाह होता है। प्रत्येक समय -संदर्भ का साक्ष्य इतिहास में दर्ज होता है। समाज के विकास में साहित्य उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।
प्रो. तिवारी ने इस बात पर बल दिया कि हिन्दी साहित्य का इतिहास भारतीय मानस की विकास प्रक्रिया को समझने का माध्यम है। भक्तिकाव्य हो या रीतिकाव्य इसमें मानवीय आकांक्षाओं और संवेदनाओं को स्वर दिया गया है। भक्ति साहित्य अपनी मानवीय भूमिका के कारण ही इतना जीवंत और उदात्त है कि आज भी उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है।
इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए अतिथि वक्ता मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय उदयपुर के डॉ. नवीन नंदवाना ने कहा कि हमारा समूचा मध्यकालीन साहित्य भारतीय मूल्य-व्यवस्था का परिचायक है। साहित्य के इतिहास के माध्यम से हम अपनी परम्परा और संस्कृति के विकासमान सूत्रों से परिचित होते हैं।
स्वागत उद्बोधन देते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि साहित्य मानवीय चेतना का द्योतक होता है। साहित्य के इतिहास से मानव सभ्यता के विकास के विविध सोपानों का पता चलता है। हमारा प्राचीन साहित्य मानवीय जिजीविषा का साहित्य है, जिसमें मानवीय संवेदना की तड़प है।
इस अवसर पर वक्ताओं ने प्रतिभागियों के प्रश्नों पर गंभीर चर्चा-परिचर्चा भी की। प्रा. सत्येन्द्र शेंडे, डॉ. सपना तिवारी, डॉ रीना सिंह, डॉ. संतोष , प्रा. लखेश चंद्रवंशी, प्रा. जागृति सिंह, सहित अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी- विद्यार्थी जुड़े थे। अतिथि परिचय डॉ.एकादशी जैतवार ने दिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संतोष गिरहे ने तथा संचालन डॉ. सुमित सिंह ने किया।