विनम्रता सबकुछ जोड़ देती है : डॉ विनोद नायक
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साहित्यिकी में गजलों ने किया मंत्रमुग्ध
नागपुर। कहते हैं राम ज्ञानी थे, तपस्वी थे, दानी थे, खगोलज्ञाता थे तो रावण महाज्ञानी, महातपस्वी, महादानी व महाखगोलज्ञाता था। बस अंतर तो इतना ही था कि रावण में अहंकार था तो राम में विनम्रता थी। अहंकार में रावण ने सबकुछ डूबा दिया तो राम ने विनम्रता से सबकुछ जोड़ लिया। उक्त विचार विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिकी के संयोजक डॉ विनोद नायक ने बहारे गज़ल कार्यक्रम में व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता माधुरी राऊलकर ने की। वरिष्ठ शायर रामकृष्ण सहस्रबुद्धे मंचासीन रहे। अतिथि स्वागत प्रा आदेश जैन ने किया।
गजलकार हाजी जफर राही ने "लौट आने में हमें कितने जमाने लग गये, जितने भी रिश्ते पुराने थे ठिकाने लग गये" गजल पेश की। कृष्ण कुमार द्विवेदी ने "लड़ गई आँख तो फिर लड़ाये रखना, उनकी यादों को सदा दिल में जलाये रखना" गजल प्रस्तुत की। डॉ भोला सरवर ने "चुपके चुपके सांसों में मेरी समाता कौन है, कोई बतलाएगा मुझको आजमाता कौन है" गजल पेश की। माधुरी राऊलकर ने "अपनों के लिये प्यार अौर नफरत होते हुए, सारे जहाँ से लड़ पड़ी हिम्मत होते हुए" गजल प्रस्तुत की। प्रा. आदेश जैन ने "अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ, आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ" गजल प्रस्तुत की।
सुरेखा खरे ने "मेरी तुम्हारी दास्ताँ हर आदमी कहता गया, मंजिलों का है पता न रास्ता बढ़ता गया" गजल प्रस्तुत की। हेमलता मिश्र ने "सूरज चंदा सा चमकने का करो दावा फिर, पहले कुटिया में दिया बनके तो जलना सीखें" रचना प्रस्तुत की। शादाब अंजुम ने "मां यह कहती थी कि सोने का निवाला दो उसे, लेकिन औलाद पे नज़रें रखो दुश्मन की तरह" गजल पेश की। उमर अली अनवर ने "तुमको किसी से प्यार हुआ है बोलो ना, इश्क में दिल बेजार हुआ है बोलो ना" गजल पेश की।रामकृष्ण सहस्रबुद्धे ने "प्यार मैंने है किया पर लोग नफ़रत कर रहे, आदमी के पास जो है वो उसी को बांटता" गजल प्रस्तुत की।
मणिद्र सरकार मणि, गुलाम मोहम्मद खान आलम, मजहर कुरैशी, शमशाद शाद, प्रीति दुबे, मिजान हाशमी, अरूण खरे व रितिक रंगगारी ने अपनी गजलों से मंत्रमुग्ध कर दिया।