सामाजिक उन्नयन के लिए सामूहिक उदारता ज़रूरी
वैसे तो दान जैसे नेक कार्य के लिए किसी अवसर से बंधे रहना उचित नहीं, लेकिन परम्परानुसार
हमारे कुछ त्यौहारों जैसे मकर संक्रांति, अक्षय तृतीया, दीपावली इत्यादि में दान करना शुभ माना जाता है। इसी तरह दूसरे धर्मों में भी कई मान्यताएं होंगी। परन्तु सभी धर्मों में सर्वोपरि "मानवता का धर्म" उदारता के लिए, हमें किसी ख़ास दिन तिथि से नहीं बांधता। इसलिए हमें सच्चे जरूरतमंद लोगों की मदद उनकी आवश्यकता व अपनी इच्छाशक्ति के अनुसार कभी भी करते रहना चाहिए।
लेकिन कई बार हम अपने जीवन की भागदौड़ में इतने व्यस्त होते हैं कि बहुत कुछ देने की इच्छा होते हुए भी उस ओर ध्यान नहीं दे पाते। ऐसे में ज़रूरी है कि कुछ जागरूक नागरिक सामने आएं और पहल का बीड़ा उठायें। सभी को याद दिलाएं कि ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जो उनके पास नई की नई रखी है, यूँ ही पड़ी पुरानी हो रही है और उनके किसी काम की नहीं। ऐसे में बहुतों के घरों से ढेरों सामान निकलने लगते हैं। बस उन सबको इकठ्ठा करके आस-पास के सभी इच्छुक, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सम्मान सहित दे दिया जाये। यह बहुत सरलतापूर्वक संपन्न होता है और ग्राही वर्ग को भावविभोर कर देता है।
दिलचस्प बात यह है कि जब ऐसी सोच आवाम के समक्ष आती है, तो उनके ह्रदय की सुषुप्त उदारता अचानक सक्रिय हो जाती है और वे अपने ह्रदय की भावना व सामूहिक सोच को सफल बनाने के ध्येय से उत्प्रेरित होकर बहुत से सामान निकालने के जोश में आ जाते हैं। ईश्वर की असीम आज्ञा व अनुकंपा से विजत कुछ वर्षों से मैं इस पहल की सूत्रदार रह चुकी हूँ, इसलिए हमारी कर्मठ सद्भावना टीम इस अनुभूति से बख़ूबी परिचित है।
लेकिन जब हम इस पहल को सामूहिक रूप से निष्पादित करते हैं तो दीवाली, दशहरा जैसे बड़े त्योहारों के कुछ दिन पूर्व करना उत्तम है, क्योंकि त्योहारों में उल्लास भरने के लिए हर परिवार अपनी हैसियत के अनुसार कुछ खरीददारी करता है, लेकिन आर्थिक तंगी से जुझ रहे लोग अपना मन मारकर रहते हैं ऐसे में उनसे बेहतर आर्थिक स्थिती वर्ग का सामाजिक दायित्व है कि वे अपने आस-पास के कुछ ऐसे लोगों की मदद करें या मार्गदर्शन करें, उन्हें आगे बढ़ने के कुछ सार्थक व सकारात्मक उपाय बताएं ताकि उन्हें तिरस्कृत महसूस न हो। और ध्यान रहे दान के इस पवित्र अनुष्ठान में सिर्फ नए सामान ही देने चाहिए ताकि त्योहारों के पहले ज़रूरत मंदों को भी कुछ नयी चीज़ें मिल जाये।
वृहद् दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह सामाजिक उन्नयन व समरूपता के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सोच तो बहुत से भावुक व उदार लोगों को अच्छी लगती है परन्तु निष्पादन में इसलिए दिक्क़त आती है क्योंकि लोग ज़रूरतमंदों में भी भेदभाव करते हैं, वे अपने आस-पास के अनेकों गरीब लोगों को छोड़कर, उन्हें दूर-दूर तलाशते हैं। जब दान ही करना है तो नामी संस्थाएं क्यों ढूँढना? क्यों न उन्हें देना जिनसे हम व्यक्तिगत तौर से परिचित हैं, उनकी दुआएं जो असीम संतुष्टि देगी वह अनजानों के हाथ जाने से नहीं मिल सकती क्योंकि दान का सामान लंबी दूरी तय करते-करते लगभग भावनाहीन हो जाती है।
शशि दीप ©
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मुंबई