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धेनु ही धर्म...


समीक्षा 

आदिकवि वाल्मीकि से लेकर ,कालिदास,  तुलसीदास, मैथिलीशरणगुप्त, हरिऔध, प्रसाद, दिनकर, नरेश मेहता आदि सभी की ख्याति के पीछे उनके द्वारा अपनी आदि सांस्कृतिक धारा में प्रवेश कर उसकी युगानुरूप प्रतिष्ठा कर देना है. सनातन भारतीय वांग्मय की पृष्ठभूमि के वैविध्य और विस्तार की तो कोई सीमा ही नहीं है. अतः एक सहृदय भारतीय चेतना सदा अतीत की ओर झाँककर यह समझने की चेष्टा करती रही है कि इससे हमें अपने वर्तमान को सँवारने में क्या सहायता मिल सकती है

मालवा के लाड़ले कवि श्री मुकेश मोलवा द्वारा सृजित कालजयी ग्रंथ 'धेनु ही धर्म'
आश्चर्यचकित और हृदय आनन्दित कर गया।
इतना विशद अध्ययन ... गहन शोध अत्यंत सराहनीय है।
धेनु ही धर्म एक सम्पूर्ण ग्रंथ है।
धेनु महात्म्य की इतनी सुंदर, व्यापक, सप्रमाण विवेचना दुर्लभ है।
इस ग्रंथ में आठ सर्ग हैं। देव सर्ग, ऋषि सर्ग, ऋषिका सर्ग, ग्रंथ सर्ग, नृप सर्ग, कृष्ण सर्ग, पंथ सर्ग, विशिष्ट सर्ग देव सर्ग में श्री गणेश, कार्तिकेय, आदित्य, वसु, रूद्र, भैरव, त्रित, अग्नि देव, बुध, धनवंतरी

सभी ने धेनु के महत्व को सिद्ध किया है।धेनु की महत्ता अद्भुत है।उसी के प्रताप से जग प्रकाशित है।
प्रथम पूज्य श्री गणेश जी को गौ के दूध से बने मिष्ठान ही प्रिय हैं।कामधेनु के दूध तथा घी से निर्मित भोज्य से ही उन्हें तृप्ति होती है, ऋषि सर्ग में  ऋषि अंगिरा सप्तऋषियों में जिनकी गिनती है

'धेनुधन धन्यातिधेनु आदिधेनुधन्य
धेनु पूजिते महायोगिमूर्धन्य।"

कहकर धेनु महात्म्य बताते हुये कहते हैं, धेनु के हित का आचरण ही धर्म का आचरण है। धेनु ही धर्म  है। अगस्त्य, अत्रि, अग्निवेश, आपस्तबन, आरुणि, ऋष्य श्रृंग, ऐतरेय, कण्व,भारद्वाज, च्यवन, लोमश,धौम्य,शौनक, वामदेव, पुलह, त्रिजट,सत्यकाम जाबाल, पतंजलि, पिप्पलाद, वात्स्यायन, चरक, जैमिनी,याज्ञवल्क्य, मार्कण्डेय,गर्ग, जमदग्नि, पुष्कर, वशिष्ठ, गौतम, वेदव्यास जी,आद्यगुरु शंकराचार्य, तुलसीदास सभी ने धेनु ही धर्म के निष्कर्ष दिए।

ऋषिका सर्ग में अदिति, गार्गी, लोपामुद्रा, अपाला, घोषा, मैत्रेयी, धेनु ही कर्म को धारण कर गौरवशालिनी होती हैं।

ग्रंथ सर्ग में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्व वेद, वेद ऋचा, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, ब्रम्हांड पुराण, अग्निपुराण,विष्णुस्मृति, बृहत्पाराशरस्मृति, महाभारत, रामचरित मानस, श्रीमद्भगवद्गीता, गवोपनिषद तक गौ महात्म्य बताया है।

श्रीमद्भगवद्गीता में धेनु के महत्व को केशव ने "गायों में मैं कामधेनु "कहकर प्रतिपादित किया है।

नृप सर्ग मे दिलीप, नहुष,श्री रामचन्द्र जी, सहदेव, बप्पा रावल, गोगादेव, पाबुजी, बिग्गा जी,तेजा जी,छत्रपति शिवाजी तक गौ भक्ति के उदाहरण प्रस्तुत किये।

शिवाजी अवतीर्ण शिव कृपा भवानी
जीजा के संस्कार रुद्र की रौद्र कहानी
मुगल थर्राते घबराते शत्रु में हाहाकार,
अतुलित बल भैरव - सा दुधारी तलवार।
रामदास कहते गौ ब्राह्मण प्रतिपालक
गौ हेतु प्रथम वार करते शिवा बालक
गौ धर्म गौ हरि गौ हर गौ माता शक्ति
शिवाजी छत्रापति नित्य करें गौ भक्ति


समर्थ रामदास भी जिन्हें गौ ब्राह्मण प्रतिपालक कहते हैं,बालक रूप में पहली बार मुगलों पर गौ माता के हित में प्रहार करते हैं। बहुत ही मनभावन सर्ग है यह।
भूषण जी सहज ही याद आते हैं, यह सर्ग पढ़ते हुए....!

कृष्ण सर्ग में कृष्ण ,गौ - चारण, गोपाल,गोवर्धन, गोविंद, सुरभि प्रसंग, अन्नकूट तक गौ का महत्व प्रतिपादित है।

"हरिअवतार धर्मसंस्थापना कारण
कन्हैया चले अरण्य हेतु गौचारण
मोरपंख माथे गोरोचन तिलक भाल
नन्दनन्दन यशोदालाल भये गोपाल"

सुरभि प्रसंग इतना मधुर है कि रोम - रोम आनन्दित हो उठा। माँ सुरभि के रोमकूपों से सम्पूर्ण गौ की सृष्टि हुई।

गुरुगोविंद सिंह गौ रक्षक रहे सदा तेग।
खालसा पंथ के मूल में गौरक्षा आवेग।

पंथ सर्ग में सिक्ख, जैन, बौद्ध, वल्लभ सम्प्रदाय, रामस्नेही सम्प्रदाय, स्वामीनारायण सम्प्रदाय तक गौ सेवा की  महिमा का गान है।

विशिष्ट सर्ग में समुद्रमंथन, पशुपति, गोदावरी, गौ - तीर्थ,गौ - प्रदक्षिणा, गौमती विद्या, गोदान, गोदान से उच्चलोक,पंचगव्य,विशेष नाम,भारतीय गौ नस्ल, सांड (नन्दी)जाति, सिक्कों पर गौ वृषभ, श्रीराममंदिर निर्माण में धेनु, विश्ववन्दनीया गौ, दाना भगत,गौवंदन।
अतिविशिष्ट सर्ग है।

गौवंदन के साथ ही ग्रन्थ इति होता है। जैसा कि भूमिका में लिखा गया कि
"सनातन के शाश्वत मूल्यों का  काव्य निरूपण
सनातन के साहित्यिक क्षीरसागर में बिखरे भारतीय आध्यात्म दर्शन,तत्व मीमांसा के धेनु मोती को एक घट में स्थापित कर, साहित्यिक मंथन के पश्चात 'धेनु ही धर्म' शब्दामृत है।" शब्दशः सत्य प्रतीत हुआ!
इस ग्रंथ में आदिकाल से लेकर वर्तमान तक के गौ भक्तों द्वारा बताई गयी गौ महिमा है।
माँ शारदा की विशेष कृपा से प्रकाशित हुआ हृदय
जब भाव किरणों को लेखनी में समाहित कर सृजन करता है, तब 'धेनु ही धर्म ग्रन्थ' रूप लेता है।
जो हिन्दी साहित्याकाश में सदा दैदीप्यमान रहेगा।।

साहित्य प्रेमी अवश्य पढ़ें!!!
इस सांस्कृतिक धरोहर को सभी साहित्य प्रेमियों,सँस्कृति के रक्षकों का स्नेहाशीष  मिले ..।
एक श्रेष्ठ,सम्पूर्ण,अनूठे ग्रंथ सृजन की हार्दिक बधाई!
एवम अनन्त शुभकामनाओं सहित...

- समीक्षक :
रागिनी स्वर्णकार (शर्मा)
शिक्षाविद एवं साहित्यकार
इन्दौर

कृति -"धेनु ही धर्म" गौ ग्रंथ
लेखक - कवि श्री मुकेश मोलवा
प्रकाशन - वाग्देवी प्रकाशन, इन्दौर

साहित्य 4300700212102151182
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