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साहित्य में पूरा समाज समाया है : डॉ. विनोद नायक


नागपुर। साहित्य एक विशाल वृक्ष है। इसमें कलियाँ हैं, फूल हैं, डालियाँ हैं, पत्ते हैं। विशेष बात यह कि यह जितना फैला है उतना ही इसकी जड़ें मजबूत हैं। इसमें ज्ञान है, दर्शन है, कला है, संस्कृति है, सभ्यता है, इतिहास है, र‍ाजनीति है, धर्म है। कहने का आशय यह है कि साहित्य में पूरा समाज समाया है। उक्त विचार विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिकी के संयोजक डॉ. विनोद नायक ने बहारे गजल कार्यक्रम में व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता शायर शमशाद शाद ने की। अतिथि स्वागत संयोजक प्रा. आदेश जैन ने किया। संचालन संयोजक डॉ विनोद नायक ने किया।

सर्वप्रथम शायर शादाब अंजुम ने क्या हुआ अगर इश्क ने तुमको दिवाना किया है, यह वो शह है जिसने गालिब को निकम्मा किया है गजल पेश की। माधुरी राऊलकर ने महकता गुलाब होते आप, सुनहरा ख्वाब होते आप गजल प्रस्तुत की। तन्हा नागपुरी ने अभी जिंदगी के करम नाखुदा हैं, मजारों के जानिब नाखुदा है गजल प्रस्तुत की। हफीज शेख नागपुरी ने पहाड़ों पे पानी का चश्मा देखा, प्यासों ने रब का करिश्मा देखा गजल प्रस्तुत की।

मन्जू कारेमोरे ने मिल गई मुझे तो खुशी दिल की,  आपने बात जो कही दिल की गजल पेश की। प्रा. आदेश जैन ने होश वालों को खबर क्या, जिंदगी क्या चीज है, प्यार कीजिए फिर समझईए  आशिकी क्या चीज है गजल प्रस्तुत की।
शायर हाजी जफर अली राही, मणिद्र सरकार मणि, मजहर कुरैशी, शमशाद शाद, रितिक रंगारी, गुलाम मोहम्मद खान आलम व अरविंद बेगडे ने अपनी प्रस्तुति से समा बाँधा।
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