मन बहलाव का साधन नहीं वह...
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भारत की आजादी का पिच्चतरवां वर्ष! जिसे हम अमृत महोत्सव वर्ष के रूप में मना रहे हैं। इन पिच्चतर वर्षों में भारत में बहुत कुछ बदला है। कुछ अच्छे बदलाव हुए हैं। देश में बडी़ बडी़ चार पहिया गाडि़यां आई हैं, सिक्स लेन, फोर लेन लंबी चौडी़ सड़के बनी है, जिनपर विकास की गाडियां दौड़ लगा रही हैं, छोटी मोटी दुकानों की जगह बडे़ बडे़ शापिंग माल ने ले ली है।
बडी़ बडी़ पांच सितारा, सात सितारा होटलें खुली हैं, पर्यटन का विकास हुआ है, उद्योग धंधों का विकास भी हुआ है, नई शिक्षण संस्थाएं खुली हैं, याने बहुत कुछ बदला है। तो फिर क्या नहीं बदला ? जब यह प्रश्न विचार में आता है तो सर्व प्रथम ध्यान जाता है आधी आबादी की ओर। वह आबादी जिससे यह दुनिया है। जिसके बिना संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
अधिक क्या? वह ना होती तो वे भी कहां होते ? पर उसकी स्थिति में कितना बदलाव आया हैं ? इस पर गहराई से विचार करें तो दृष्टि हाल ही में कर्नाटक विधान सभा में कांग्रेस के विधायक आर. रमेश कुमार द्वारा दुष्कर्म को लेकर उनके द्वारा दिए गये अत्यंत लज्जास्पद , शर्मनाक बयान पर जाती है। और उससे भी अधिक दुःखद है उनके इस बयान पर विधानसभा अध्यक्ष जी का हंसना । क्या ये देश के शासक हैं,? देश के कर्णधार? देश के नीति निर्माता? या फिर गली कूचों में आवारागर्दी करते नवयुवक? जिन्हें शिक्षा, संस्कार नीति, धर्म से कुछ लेना देना नहीं ?
आर रमेश कुमार के ऐसे शर्मनाक बयान पर जहां संसद की महिला सांसदों ने उनके खिलाफ कडी़ कार्यवाही की मांग की, इसे अक्षम्य अपराध बताया वहीं देश की असंख्यों महिलाएं अंदर ही अंदर उबल पडी़ं, न कोई विरोध, धरना, या प्रदर्शन! जानती हैं परिणाम ।।और वही हुआ ।आर. रमेश कुमार के माफी मांगने से बात आई गई हो कई । पर क्या सचमें इसे समाप्त समझ लिया जाना चाहिए ?
आज इन्होंने माफी मांगी कल फिर कोई नेता, इसी तरह की अभद्र टिप्पणी कर के माफी मांगेंगे, और कहेंगे मेरी बात को गलत ढंग से लिया गया, अब प्रायः ऐसी बातें कहकर लोग मुक्त हो जाते हैं, पर वास्तव में क्या यह समस्या से मुक्ति है ?
आवश्यकता इस समस्या को अत्यंत गंभीरता से लेने की है ,ताकि कोई फिर महिलाओं को लेकर ऐसी अपमानजनक, अभद्र टिप्पणियां ना करें और महात्मा गांधी जी ने महिलाओं को जो बराबरी का, पुरुषों की समानता का, सम्मान का दर्जा दिया था, उसे पद की शपथ लेते समय अवश्य याद रखें।
गांधी जी ने स्त्री को अबला कहने वालों की भर्तसना करने हुए कहा था, 'आदमी जितनी बुराईयों के लिए जिम्मेदार है, उसमें सबसे ज्यादा घटिया, विभत्स पाशविक बुराई उसके द्वारा मानवता के अर्धांग नारी जाति का दुरुपयोग है वह अबला नहीं, नारी है ।नारी जाति पुरुष जाति की अपेक्षा अधिक उदात्त है।'
स्त्री को मन बहलाव के साधन का विरोध करते हुए गांधी जी ने कहा था। यदि मैंने स्त्री के रूप में जन्मलिया होता तो मैं पुरुषों के इस दावे के विरुद्ध विद्रोह कर देता कि स्त्री उसके मन बहलाव का साधन है।
स्त्री को समानता, सम्मान व उच्च स्थान देने वाले महात्मा जी की आत्मा अवश्य ही तड़फ उठती होगी अपने ही देश के कर्णधारों के स्त्री के प्रति ऐसी सोच व ऐसे अपमानजनक विचारों को सुनकर। ऐसे गंभीर मामले को लेकर राजनैतिक दलों द्वारा एक दूसरे के प्रति आरोप ,प्रत्यारोप लगाना व उसे दबाने का प्रयत्न करना
यदि भविष्य में इसी तरह चलता रहा़ तो बडे़ दुःख के साथ कहना पडे़गा कि अभी हमने विकास की पहली सीढी़ भी पार नहीं की है। भौतिक विकास हमने चाहे जितना भी कर लिया हो, वैचारिक दृष्टि से अभी भी हम पशु युग में ही विचर रहे हैं। जबतक समाज में स्त्री के प्रति सम्मान का भाव विकसित नहीं होता, उसे बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता, उसकी अस्मिता की रक्षा नहीं होती सब प्रकार के विकास बेमानी हैं।
- प्रभा मेहता
नागपुर
मो. 94230,66820