उन्नयन पथ के दो साथी : स्वीकार्यता व कृतज्ञता!
पूरे साल भर के अनेकों अनुभवों के बाद जब हम दिसंबर के आखरी दिनों में पहुँचते हैं तो जाहिर सी बात है कृतज्ञता का भाव आ ही जाता है। अगर हमारे अंदर थोड़ी भी चेतना है तो हमारे दृष्टिकोण से साल में जो भी घटनाएं हुई उनके बारे में अन्दर से विचार आता है क्योंकि ज़िन्दगी हमारी इसी चेतना में एकीकृत विभिन्न भावों की अभिव्यक्ति ही तो है। सुख, दुःख, अट्टहास व सिसकियाँ सभी समय-समय पर आते-जाते रहते है और हर घटना के बाद हमारे अंदर कुछ बदलाव सा महसूस होता है और हम खुद से प्रत्यक्ष होते हैं।
देखा जाये तो पूरा साल वास्तव में समय का एक बड़ा समूह ही तो है इसलिए जिस प्रकार प्रतिदिन की समाप्ति के बाद रात्रि की बेला आती है और मन संजीदा सा होने लगता है व दिन भर में हमारी सोच के अनुसार जो भी अच्छा हुआ लगता हैं हम उसके लिए खुद को सौभाग्यशाली समझते हैं (भले ही यह भाव कुछ ही पलों के लिए सही) साल के अंत में भी वैसा ही अनुभूत होता है।
कृतज्ञता का ऐसा भाव हमें स्वीकार्यता सिखाता है, क्योंकि चाहे विभिन्न हालात हों या अनेक विचित्रताओं, खूबियों या खामियों से युक्त मनुष्यों से परस्पर मेल-मिलाप, सबमें कुछ दिलचस्प रहस्य होता ही है और जिज्ञासु मनुष्य अपनी दिलचस्पी के अनुसार कुछ न कुछ ग्रहण करने योग्य ढूंढ ही लेता है। क्योंकि यह तो सार्वभौमिक सत्य है कि सृष्टि में कोई भी मनुष्य चाहे जैसा भी हो त्यज्य या उपेक्षणीय नहीं हो सकता। यह भी देखा जाता है कि एक ही वातावरण में पले हुए लोगों में ज़मीन आसमान का फर्क हो सकता है ऐसे में स्वीकार्यता ही शांतिपूर्वक जीवन की कुंजी है।
प्रसिद्ध दार्शनिक खलील जिब्रान ने एक बार कहा था "लोग मुझसे कहते हैं कि यदि तुम अपने को पहचान लो तो सब आदमियों को पहचान लोगे; किन्तु मैं कहता हूँ कि जब तक मैं सब आदमियों को न पहचान लूँ तब तक अपने को पहचान ही नहीं सकता।" इसलिए हमें बाहरी दुनिया में जो भी है जैसा है फिर भी उनमें कुछ अच्छाइयां ढूंढकर लाभान्वित होने का प्रयास करना चाहिए और कृतज्ञ महसूस करना चाहिए कि हमारे अंदर ईश्वर ने इतनी समझदारी दी है और हम उसे उपयोग में ला पा रहें हैं। वैसे भी यह शरीर नश्वर है, और हममें से प्रत्येक इस विश्व की विशाल जनसंख्या में मात्र एक संख्या है।
यदि एक अंक को हटा दिया जाए, तो यह ठीक उसी प्रकार होता है जैसे एक विशाल महासागर से पानी की एक बूंद निकालना। इसलिए हमारा अस्तित्व केवल उन लोगों के लिए अनमोल है जिसे हमने अपने प्रेमभाव से उनके प्रति कर्तव्यों, विचारों, सद्भभावनाओं और कर्मों के माध्यम से इकट्ठा किया है। बाकी दुनिया अपनी सामान्य गति से वक्त के साथ अपनी रफ्तार से चलती रहेगी।अतेव गहराई समझना ज़रूरी है कि प्रत्येक मनुष्य की ख़्वाहिश, लक्ष्य, उसकी दिशा व उसकी क्षमता इत्यादि के आधार पर विभिन्न चुनौतियाँ उसके सामने आती जाती है और जो ऐसी सभी चुनौतियों को, ज़िन्दगी के कुदरती रंग समझ कर स्वीकार करता जाता है व प्रतिपल कृतज्ञता महसूस करता है वही जीवन में संतुष्ट होता है!
- शशि दीप 
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मुंबई