शहीद भगतसिंग के देश प्रेम की बातों से प्रेरित थे क्रांतिवीर हेमू कालानी
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शहीद हेमू कालानी की पुण्यतिथि 21 जनवरी पर विशेष
सिंध का नौजवान क्रांतिकारी हेमू कालानी जिसे सिंध का भगत सिंह कहा जाता है। शहीद भगत सिंग की देश प्रेम से ओत प्रोत बातों से बहुत प्रेरित हुआ था। देश के लिए शहीद होने वाले भगतसिंग के बारे में हर कोई जानता है। जिन्होंने देश की आजादी के लिए खुशी-खुशी मौत को गले लगा लिया। हेमू उनके बारे में पढ़कर मन ही मन बहुत प्रसन्न होता था। वो अपने चाचा से पुस्तकें लेकर वीरों के किस्से पढ़ता रहता था। उसकी माता जेठीबाई भी उसे देश प्रेम की कहानियां सुनाया करती थी।
यह एक संयोग ही है कि शहीद भगत सिंह का शहीदी दिवस व हेमू कालाणी का जन्म दिवस एक ही दिन आता है। एक बार हेमू कालानी पिता को अंग्रेजी सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया था। हेमू की मां ने हेमू को सब कुछ बताया तो वो पिता की बंदूक लेकर उन्हें छुड़ाने चल पड़े थे। हेमू कालाणी को बंदूक लेकर थाने की तरफ जाते देख उनके शिक्षक ने उन्हें रोका और समझाया था कि ऐसा मत करो। धीरज से काम लो।
हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को अखंड भारत के सिंध प्रांत के सख्खर शहर में पिता पेसूमल कालाणी तथा माता जेठीबाई की पवित्र कोख से हुआ था। हेमू कालानी की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा सख्खर शहर के ए.बी. हाइ स्कूल में ही हुई। वो बचपन से ही कुशाग्र बुद्वि का छात्र रहा। सख्खर के ही लोकमान्य तिलक हाइ स्कूल से उसने मैट्रिक की परीक्षा पास की।
खेल कूद में भी उसे कई मैडल मिले। हेमू कुश्ती का शौकीन था और कुशल साइकल चालक तथा कुशल तैराक भी था। हेमू के जोश को देखते हुए लोग जगह-जगह पर अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने लगे। हेमू ने अंग्रेजी सरकार को भारत से उखाड़ फेंकने का दमखम दिखाया। उसने कई घटनाओं को अंजाम दिया। ब्रिटिश उनकी निडरता से भरे कार्यों को देखने के बाद खौफ खाने लगे थे।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही वह पला बढ़ा। अतः राष्ट्रभक्ति उसमें कूट कूटकर भरी हुई थी। हेमू के मन में अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ नफरत थी। सन् 1932 में उसके चाचा डाॅ. मंघाराम कालानी ने ‘‘स्वराज सेना’’ गठित की जिसका सेना नायक उन्होंने नन्हे क्रांतिकारी हेमू को बनाया। हेमू ने खुशी खुशी इसे स्वीकार किया।
हेमू के क्रांतिकारी आव्हान से प्रभावित होकर उसके चार साथी लक्ष्मण केसवाणी, हरीराम लीलाणी, हशू सबनानी, टीकम भाटिया उसके इस आंदोलन में उसके साथ हो लिए। फिर कुछ और साथी भी उनके साथ जुड़े। देश को आजाद करवाने के उनके विचारों में अत्यधिक दृढ़ता आ गई। हेमू जब मैट्रिक की पढ़ाई का रहा था तब ही उसकी समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गई कि अंग्रेजी सरकार ने छल कपट से हमारे देश पर शासन कर रखा है तथा यह हर हिंदुस्तानी को गुलाम बनाकर रखना चाहता है।
इस प्रकार के विचार हेमू को हमेशा परेशान करते रहते थे। उसके मन में हिंदुस्तान को आज़ाद कराने की छटपटाहट होने लगी। क्रांति के इस वातावरण ने सिंध प्रांत का यह 19 वर्षीय किशोर भी क्राति पथ का राही बन गया। किसे पता था कि यह छोटा सा छात्र भारत के स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने के लिए अपने दिल में शेरे पंजाब शहीद भगतसिंह की तरह सूली को श्रृंगार बनाने की इच्छा को संजोये हुए है।
1942 में जब महात्मा गाँधी ने भारत छोड़ो आंदोलन चलाया तो हेमू अपने साथियों के साथ बड़े जोश व खरोश के साथ उसमें कूद पड़े. आगे जब इस आंदोलन से जुड़े महात्मा गाँधी, खान अब्दुल गफ्फार जैसे क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया. तो इस आंदोलन की ज्वाला और भड़क उठी। स्वराज सेना में हेमू की सक्रियता से सभी क्रांतिकारी अत्यधिक प्रभावित थे।
आखिरकार एक दिन ऐसा अवसर आ ही गया। एक दिन अचानक ‘‘स्वराज्य सेना’’ का छोटा गुप्तचर एक महत्वपूर्ण किंतु दिल दहलाने वाला समाचार लाया कि भारत के इंकलाबियों को कुचलने के लिए हथियारों से लैस हज़ारों अंग्रेज सैनिकों से लदी एक विशेष रेल गाड़ी 23 अक्टोबर 1942 की अर्धरात्रि को सिंध के रोहिड़ी शहर के स्टेशन से रवाना होगी और सख्खर से गुजरती हुई बलूचिस्तान प्रांत के क्वेटा नगर जाएगी।
अंधेरी रात में नन्हा शेर दिल किशोर थैला कंधे पर लटकाए अपने साथियों के साथ चल दिया। गंतव्य पर पहुंचकर अपने थैले में से रेल की पटरियांे के नट बोल्ट खोलने शुरू कर दिए लेकिन दुर्भाग्यवश पास ही स्थित बिस्किट कारखाने के चैकीदार ने उनकी इस गतिविधि की सूचना पुलिस चोकी में दे दी। तुरंत ही दो अंग्रेज सिपाही उस रेल की पटरी के पास पहुंच गए। हेमू का ध्यान जाते ही उसने दोनों साथियों को कहा ‘‘भागो’’ ‘‘भागो’’ं।
उसके दोनों साथियों ने उसकी आवाज़ सुनी और खतरे को भांपते हुए भाग खड़े हुए। हेमू अकेला सिपाहियों की गिरफ्त में आ गया। लेकिन फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। अंग्रेज सिपाहियों ने बंदूक की नोक पर उसे गिरफतार कर लिया और जेल की सलाखों में बंद कर दिया। कोर्ट में जब जज ने हेमू से पूछा 'फिश प्लेट उखाड़ने का तुम्हारा मकसद क्या था ?'
तब हेमू ने मुस्करा कर जवाब दिया, 'हम अपनी मातृभूमि के लिए कुछ भी करने के लिए तेयार हैं। चाहे लोगों की जान ही क्यों न लेनी पड़े।' इस पर क्षुब्ध होकर जज ने हेमू को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। सख्खर की मार्शल ला कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति हैदराबाद (सिंध) मुख्यालय पर भिजवाई तो मुख्यालय के प्रमुख अधिकारी मेजर जनरल रिचर्डसन हेमू कालाणी की बहादुरी की बातें सुनकर आग बबूला हो उठा। वह बड़ा ही निरंकुश और क्रांतिकारियों का शत्रु था।
वह क्रोध से तिलमिला उठा और प्रतिशोध की भावना से उसने हेमू की आजीवन कारावास की सजा को मृत्यूदंड में बदल दिया। लेकिन फिर भी हेमू का मन तनिक भी विचलित नहीं हुआ। फांसी से पहले जब उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने फिर से भारतवर्ष में जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। यह दुर्भाग्य की बात है कि आज की युवा पीढ़ी हेमू के अमर बलिदान से अनभिज्ञ है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की पाठ्य पुस्तकों में भारत माता के इस सपूत का कोई जिक्र नहीं मिलता।
- किशोर लालवाणी
सदस्य,सिंधी भाषा सलाहकार समिति, केेद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली