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संक्रांत


आज यूं थिड़के
अंग अंग,
आओ यार,
उड़ाएं पतंग।

दुश्मनी गर निभानी हो तो,
मैदाने-जंग में
काटे पतंग,
दोस्त मेरे
फिर सब कुछ भूल 
नाचे गाएं संग संग।

कर्मकांड और मानस भ्रम,
छोड़ धर्म-कर्म का पागलपन,
रुखी सुखी खाएं मगर,
ना छेड़ें फतवों का जहरीलापन।

मन की तंग गलियों से निकल,
हो विभोर नाचो
मेरे संग,
जिंदगी है छोटी
गम बांट लें,
तुम डोर खींचो
हम ताव दें,
मिलजुल के रहें
ना हो रंग में भंग,
यह निश्चय कर,
हम उड़ाएं पतंग।

- डॉ. शिव नारायण आचार्य, शिव
नागपुर (महाराष्ट्र)

काव्य 3944275604544708237
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