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मेरे शब्द : रति चौबे (लेखिका)


पुस्तक समीक्षा

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मेरे शब्द ही मेरे संस्मरण है और संस्मरण कभी काल्पनिक नही होते, कहते है ना जीवन एक यात्रा है और हर पल हमारे साथ कुछ ना कुछ घटित होता है बस उसे समझना चाहिए उस पल को दिल में कैद करना चाहिए। बस यही है मेरे शब्द - हर लम्हों को बडी खूबसूरती से शब्दों के मोती बन इस पुस्तक मे छाए है।

हर शीर्षक मे भाव छिपे है और आपको मजबूर करते है अरे यह.भी पढ.लो... फिर उठती हूँ।  लेखिका  श्रीमती रति चौबे ने बडी सहजता. से अपनी.व्यक्तिगत संस्मरणों को सहेजा है। सिर्फ इतना ही नही लेखिका ने सोशल मिडिया का संस्मरण के जरिए भी एक सीख दी है। अपने विवाह और प्रथम मातृत्व का सुंदर वर्णन किया की हर औरत अपने उन दिनों को याद कर  उस पल को याद कर सहम उठेगी । 

इस पुस्तक में कुछ हंसी है तो कुछ गम है। वो रूमाल का रोमांस  हो या अपने पोते की बात यह सब एक आम सी बात भले लगती हो लेकिन मन मस्तिष्क में वे छाप छोड़ जाती है और लेखिका ने इन सबको बडे ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। वो अदृश्य आवाज जैसे शीर्षक पाठको को पढने के लिए मजबूर करते है लेकिन लेखिका के जीवन का एक क्षण जो जीवन भर साथ रह कर भी पूरा ना हो सका काश !! मैं कह पाती जी हां लेखिका अपने पति से बेहद प्यार करती थी जीवन के 46 वर्षो से भी अधिक वर्ष साथ रहने के बावजूद भी बस सोचती रहकर कि मै उनसे कहूंगी की 'मै आपसे बेहद प्यार करती हूँ।" और जब वे अपनी बेटी के घर से अपने घर वापिस आने के इंतज़ार मे  सामान के साथ बेटे का इंतजार कर रही थी की मोबाइल की रिंग बजती है लेखिका खुश हो जाती की बेटा आ रहा है, और फोन उठाते ही बेटा  रोने लगता और... मां पापा खत्म हो गए.. बस लेखिका की  ख्वाहिश  दफन हो जाती है और पति श्री दिनेश चौबे भी यह मधुर बात सुने बिना हार्टअटैक से चल बसते । मेरे शब्द वाकई मे रति चौबे के मन के शब्द है। 

श्रीमती रति चौबे जो एक सौम्य सहज व अपनी  मधुर आवाज से अनेको दिलो पर राज करती है और उनकी लेखनी भी उतनी मधुर सी है । हर रिश्तों को एक सूत्र मे बांधकर चलने वाली रति चौबे विगत बीस वर्षो से हिंदी महिला समिति की अध्यक्षा है और अनेक संस्थाओं मे भी मुख्य पद पर आसीन है । एक रचनात्मक शैली जैसे व्यक्तिव की धनी रति एक कुशल आर्टिस्ट भी है और मेरे शब्द मे हर.शीर्षक मे उनके ही चित्र है जो लेखिका के व्यक्तित्व को बयां करते है।
आप सभी से गुजारिश है की मेरे शब्द को अवश्य पढे । शायद हम सब भी अपने हर पल को एक डोर में बांध रखे !!!


समीक्षक
- पूनम मिश्रा 'पूर्णिमा'
नागपुर (महाराष्ट्र)
ratichoubey@gmail.com

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