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राष्ट्रीय बालिका दिवस...


संपूर्ण भारत में 24 जनवरी को 'राष्ट्रीय बालिका दिवस' के रुप में मनाया जा रहा है। वास्तव में पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ ने 11 अक्टूबर 1912 को एक दिन बेटियों को समर्पित किया। इसके बाद संसार के अधिकांश देशों ने इसे मनाने का संकल्प लिया ।किंतु यह दिवस हर देश में भिन्न भिन्न तारीखों को मनाया जाता है। जिसमें भारत में यह 24 जनवरी को मनाया जाता है।

मन में प्रश्न उठता है आखिर हमारे जैसे सांस्कृतिक  वैचारिक दृष्टि से संपन्न राष्ट्र को भी बालिकाओं के नाम एक दिन घोषित करने की आवश्यकता क्यों पडी़? जहां बेटियों को देवी का रूप माना जाता हो, पैर पूजे जाते हों, चरणामृत लिया जाता हो वहां केवल एक दिन बेटियों के नाम क्यो ? वह तो सदा से ही पूज्य रही है। 

किंतु कैसी विडंबना है आज भी  अवश्य पूजी तो जाती है, विशेष अवसरों पर किंतु यह पूजा क्या वास्तव में पूजा है, या पाखंड ? कारण एक ओर पूजा होती है, तो दूसरी ओर जन्म के पूर्व ही उसके अस्तित्व को ही नष्ट करनेका प्रयत्न किया जाता है। क्यों नहीं चाहिए हमें बेटियां ? सभी जानते है, बेटियों के बिना संसार अधूरा है, बिल्कुल वैसा ,जेसे आत्मा के बिना शरीर ।वह तो आत्मा है, प्राण है इस सृष्टि की। उसके बिना जीवन संभव ही नहीं। यह जानते हुए भी इतनी अवांछित क्यों ?

जीवन को लाभ, हानि, फायदा, नुकसान की तराजू पर तौलने वाले इंसान को अब बेटियों में वह लाभ नहीं दिखाई देते जो बेटों में दिखाई देते हैं। कैसी सोच ? जो लाभ मिल रहा है अर्थात बेटा मिला है क्या वह बेटी के बिना संभव था ? किंतु इसका विचार क्यों नहीं हुआ ? निश्चित ही हमारे विचारों में ही खोट है। किसी भी सभ्य समाज की नींव, उसके विकसित विचार उसकी सभ्य संस्कृति ही है। अच्छे विचार ही बीज हैं, उन अच्छे विचारों को उपयुक्त, हवा पानी, धूप मिले तो वह फसल लहलहाती ही है।तात्पर्य यही कि हमें सबसे अधिक अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है। 

स्वतंत्र भारत के संविधान में तो बेटा बेटी को समान अधिकार दिए गये हैं, इसके अतिरिक्त अनेक सुविधाएं भी बेटियों के विकास के लिए दी गई हैं, कानून बने है, परंतु इन सबके होते हुए भी यदि आज बेटिया असुरक्षित है, अवांछित हैं तो यह हमारी गलत सोच का परिणाम है। विचारों से हमें बदलना होगा। परिवार के साथ साथ समाज, मीडिया, शिक्षण संस्था एंव साहित्यकारों का भी एतना ही दायित्व है ।कानून से ही सुधार संभव नहीं सबको चैतन्य रखना अनिवार्य है। यद्यपि कुछ बदलाव आया है लेकिन आज भी, बालिकाओं के साथ अन्याय अत्याचार अस्मिता लूटने, अपमानित करने, हिंसा के उदाहरण बहुतायत में मिल जाते हैं। 

ये सब तभी थम सकते हैं जब हम अपने को वैचारिक स्तर पर बदलें, अपनी सोच बदलें। बेटियां किसी से कम नहीं इस पृथ्वी पर वे ईश्वर का अनुपम उपहार है, उसके बिना संसार संभव ही नहीं। इस वर्ष भारत अपनी आजादी की 75 वीं सालगिरह मना रहा है। हम संकल्प लें बेटियों को सम्मान, उनका उचित स्थान देने का तभी वास्तविक आजादी मिल पाएगी ।हमारी आजादी बहुमूल्य होगी, आजादी की कीमत होगी।
जय भारत,जय भारती।

पौधों पर मुस्कुराते फूलों सी सुंदर बेटिया,
बटियों से ही सृष्टि,ईश्वर का उपहार है बेटियां।

        
- प्रभा मेहता
नागपुर (महाराष्ट्र)

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