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साहित्यिकी में बहारे ग़ज़ल का आयोजन


सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो.
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो.

नागपुर। विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के उपक्रम साहित्यिकी के अंतर्गत बहारे ग़ज़ल का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षा मंजू कारेमोरे का स्वागत सह संयोजक शादाब अंजुम ने अंगवस्त्र से किया। कार्यक्रम का संचालन संयोजक आदेश जैन ने किया।


कार्यक्रम में सर्वप्रथम रमेश मौन्देकर ने "विषमता का विष संसार से हटाने की बात होनी चाहिए" इस गज़ल से शुभारंभ किया। 


तन्हा नागपुरी ने "हाथ के तोते उड़ जाए तो मेरी याद करना", हफ़ीज़ शेख नागपुरी ने "रौशन मकाम करते है", कृष्ण कुमार द्विवेदी ने "सोना चांदी समझ न इसको", समीर पठान ने "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो" फिल्मी ग़ज़ल, जयप्रकाश सूर्यवंशी ने "दुनिया मे कई तरह के लोग",शादाब अंजुम ने "रंजो अलम का मारा मैं आम आदमी हूँ", 

मंजू कारेमोरे ने "कोई है जो मेरे दिल", आदेश जैन ने "सफर में धूप तो होगी", मनिंद्र सरकार ने "गम के साये से निकलकर तो देख, विष्णु शर्मा सुमन ने" मेरे हिस्से में माँ आयी" जैसी ग़ज़ल गाकर समा बांध दिया। कार्यक्रम में अजय हावरे, हरीश ख़ूबनानी, नरेश वानखेड़े व अन्य उपस्थित रहे।

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