व्यंग्यकार परिवर्तन के लिए ज्वलंत मुद्दों पर लिखें : तिवारी
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नागपुर। व्यंग्यकार को परिवर्तन के लिए ज्वलंत मुद्दों पर लिखने की जरूरत है। व्यंग्य लिखना असहमत होना है, असहमत होना ही लोकतांत्रिक होना है और लोकतांत्रिक होना ही सहिष्णु होना है। दुर्भाग्य से आज का व्यंग्यकार असहमत नहीं है। यह विचार प्रख्यात व्यंग्य आलोचक डॉ रमेश तिवारी ने व्यक्त किए।
समकालीन व्यंग्य समूह की ओर से सबद निरन्तर (विमर्श श्रृंखला) में 'वर्तमान समय और व्यंग्य के मूलभूत प्रश्न' विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। बतौर मुख्य वक्ता डॉ. तिवारी बोल रहे थे। सहभागी वक्ताओं में दिलीप तेतरवे, मधु आचार्य 'आशावादी', डॉ स्नेहलता पाठक, शांतिलाल जैन, कैलाश मण्डलेकर, रेणु देवपुरा का समावेश था। समकालीन व्यंग्य समूह के मुख्य एडमिन रामस्वरूप दीक्षित प्रमुखता से उपस्थित थे।
मधु आचार्य 'आशावादी' ने कहा कि व्यंग्यकार का नजरिया स्पष्ट होना चाहिए कि वह किसके साथ खड़ा है। वह अपने समय के सच को पहचाने और सत्ता का विरोध करें। कैलाश मंडलेकर ने कहा कि हरिशंकर परसाई की परंपरा का व्यंग्यकार होना पड़ेगा तभी सार्थक व्यंग्य लिखे जा सकेंगे। रेणु देवपुरा ने कहा कि व्यंग्य हथौड़े की तरह चोट करें। शांतिलाल जैन ने कहा कि व्यंग लेखन जनसरोकारों से जुड़ा होना चाहिए। डॉ स्नेहलता पाठक ने कहा कि व्यंग्यकार जनता की आवाज बुलंद करें। दिलीप तेतरवे ने आम आदमी के लिए व्यंग्य लिखने पर जोर दिया।
संचालन स्नेहा देव ने किया। संयोजन आरती शर्मा का रहा। आभार डॉ किशोर अग्रवाल ने माना। सफलतार्थ संयोजन समिति के रणविजय राव, टीकाराम साहू 'आजाद', अनंत श्रीमाली, टेड्डी गुप्ता आदि ने प्रयास किया। कार्यक्रम में रमेश सैनी, बीएल आच्छा, ब्रजेश कानूनगो, अरुण अर्णव खरे, पिलकेंद्र अरोरा, हरिशंकर राढ़ी, विजी श्रीवास्तव, अलका अग्रवाल सिगतिया, दीपा स्वामीनाथन, भंवरलाल कासानी, अरुण सातले, अभिजीत दुबे, संजीव शुक्ल, सुनील जैन राही, सूर्यदीप कुशवाहा आदि उपस्थित थे।