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प्लास्टिक पैकिंग पर लगी रोक के चलते कागज की मांग बढ़ने लगी


कागज बनाने की मील से मिल सकता रोज़गार

नागपुर (आनंदमनोहर जोशी)। देश में प्रदुषण और प्लास्टिक से देश में विभिन्न क्षेत्र को हो रही हानि के चलते प्लास्टिक थैलियों पर रोक लगाई गई। अनेक वर्षों से भारत के व्यापारिक प्रतिष्ठान जिसमे मिठाई, नमकीन, नाश्ता, आटा, मैदा, रवा सहित अनेक वस्तुओं की पैकिंग और थैलियों बैग के लिए कागज का उपयोग बढ़ चुका है। साथ साथ वृक्ष के पत्तल के स्थान पर यूज़ एंड थ्रो थालियाँ, कागज़ के ड्रोन, कागज़ के गिलास का प्रयोग होने लगा है। 

वहीँ अब ऑनलाइन शिक्षा होने से भारत के शालाओं, महाविद्यालयों मे नोट बुक, किताबों का प्रयोग भी कम होने लगा है। देशभर के व्यपारी जहाँ पहले व्यापार हिसाब किताब के लिए बहीखाता, कागज़ की वाही का प्रयोग करते थे। कंप्यूटर, लैपटॉप पर व्यापार के हिसाब किताब होने से भी कागज की मांग घट गई है। समाचार पत्र क्षेत्र में भी, ऑनलाइन होने से उद्योग पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। दूसरी ओर यूक्रेन और रूस के युद्ध के साथ कोरोना महामारी के होने से अखबार उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे है। 

अमेरिका सहित युरोप की अंतर्राष्ट्रीय हवाई जहाज, समुद्री जहाज से आनेवाले कच्चे माल का आयात विश्व में घट रहा है। अखबार के कागज बनाने के उद्योग दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, रूस के साथ भारत में भी है। भारत के कर्णाटक डांडेली, महाराष्ट्र के बल्लारशा और आंध्र प्रदेश तेलंगाना के कागज़नगर के साथ नागपुर के पास कोंढाली में भी पेपर मिल उद्योग है। पेपर मिल में पुराने कागज़ पेपर को गलाकर उससे अखबार के नए कागज का निर्माण किया जाता है। 

पुराने करुगाटेड बॉक्स, पुराने अखबार, पुराना कॉपी किताब के प्रयोग से लुगदी बनाकर नए पेपर रोल का निर्माण मीलों में किया जाता है। कागज़ के उद्योग में एलम, रसायन, नील, टीनोपाल, सोडा से स्लरी का निर्माण होता है। लिक्विड रसायन को खुले जगह पर छोड़ दिया जाता है। काग़ज़ की लुगदी की दुर्गन्ध से और बांस से बनाई लुग्दी की दुर्गन्ध से कागज़ के उद्योग बंद कर दिए गए। लेकिन वर्तमान समय में दुनिया के सभी क्षेत्र कागज पर निर्भर हैं। ऐसे में भारत जैसे देश में काग़ज़ के उद्योग को बढ़ावा देकर काग़ज़ की मिलों को शुरू करने की सख्त आवश्यकता है। वहीं अखबारों में अच्छी गुणवत्ता वाले कागज की मांग है। 

भारत सरकार को देश के उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पूर्व और पश्चिम के साथ मध्य भारत में कागज की मिलें शुरू करना होगा। जिससे कि आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना काग़ज़ उद्योग में भी साकार हो सकेंगी। हज़ारों लोगों को रोज़गार भी प्राप्त होगा। भारत में कागज की हो रही कमी को भी पुरा किया जा सकता है। आज भारत में अखबार की रद्दी के भाव भी 20/- प्रति किलोग्राम हो चुके है। जो कि एक समय 4/- से 5/- प्रति किलोग्राम हुआ करते थे। जब देश में अखबार भी 50 पैसे से 1.50 रु. में मिला करता था। वर्तमान समय में अखबार 2/-, 3/-, 5/- के हिसाब से पाठकों के लिए सुलभ है। जबकि देशभर में नमकीन, मिठाई, किराना सामान की खुली वस्तुओं की पैकिंग के लिए आज भी अखबार और सूती धागे का प्रयोग हो रहा है।
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