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विकास बनाम पर्यावरण


5 जून को पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। बहुत ही खुशी की बात है कि एक दिन किसी के लिए भी कोई भी दिवस सुनिश्चित कर दो फिर उसे वर्ष भर खुद भी लूटो और और अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने के लिए उस पर्यावरण को लूटने की खुली छूट दे दो। 

आज के परिपेक्ष्य में जिस तरह समस्त देश के सत्तासीन और आमजन पर्यावरण के प्रति उदासीन हैं तो उनमें से किसीको इसे मनाने का कोई अधिकार कैसे हो सकता है?? क्योंकि पर्यावरण दिखावे का विषय नही जीवन का अविभाज्य हिस्सा है। जिस तरह भारत मे प्रत्येक प्रदेश की सरकार वन सम्पदा को माफियाओं और उधोगपतियों के हाथ खुलेआम लुटा रही तो आज इंदिरा गांधी जी और मनोहर पर्रिकर साहब बहुत याद आते हैं जिनके कार्यकाल में बड़े बड़े प्रोजेक्ट सिर्फ इसलिए रुकवा दिए जाते थे कि उनसे वन संपदा नष्ट हो सकती थी।

कभी -कभी शब्द भावनाओं का साथ छोड़ देते क्योंकी समझ नही आता भारतवासियों पर गुस्सा करे या तरस खाये क्योंकि जिस भारतभूमि में वृक्षो, नदियों, गाय, जीवो को पूजने की परंपरा वेदों में वर्णित है, जो हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा है उसकी ऐसी दुर्दशा शायद ही किसी देश में होगी, क्योंकि एक तो न हम किसी की सुनना चाहते हैं न दूसरे देशों से कुछ सीखना चाहते हैं। आज देश के तमाम बड़े जँगल जो पूरे भारतवर्ष की जलवायु को निर्धारित करते हैं, सरकारों ने उन्हें खुलेआम लूटने की छूट दे रखी है। चाहे बक्सवाहा मध्यप्रदेश हो, हषदेव छत्तीसगढ़ हो। देश के कश्मीर से लगाकर कन्याकुमारी तक के जंगलो की एक समान व्यथा है। 

देश की तमाम बड़ी नदियों में जलराशि 45 से 50 प्रतिशत तक कम हो चुकी हैं क्योंकि इनकी सहायक नदियां लगभग खत्म हो चुकी हैं। इनके प्राणक्षेत्र जो हरे भरे जँगल थे वो वन माफियाओं के और राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन पर बलि चढ़ चुके है। रेत माफियाओं ने नदियों को खोखला कर दिया है तो उधोगपतियों ने भी इन जीवनदायिनी नदियों को जहरीला करने में कोई कसर नही छोड़ी है। ऐसा लगता है देश मे वन संपदा को लूटने की होड़ मची है लेकिन जो सबसे बड़ी बिडम्बना है वह यह है कि आम आदमी सबकुछ देखते हुए क्यो चुप है? क्योंकि ये लूटने वाले तो किसी और देश मे बस जाएंगे लेकिन आम जनता कहा जाएगी। हमे याद रखना चाहिए कि धर्मयुद्ध में दर्शक नही योद्धा बनना पड़ता है। विकास के नाम पर जो लूट चल रही है उसे चुपचाप देखने वालों को ही सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ेगा क्योंकि
'समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा, उसके भी अपराध।।'

महाभारत में चीरहरण दुर्योधन, दुशासन ने किया था किंतु मौन रहने की सजा भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे परमज्ञानी को भी मिली थी।

विकास के फर्जी सपनो के आधार पर दोनो हाथों से वन संपदा को बर्बाद किया जा रहा है कि वह दिन दूर नही की हमारी आने वाली पीढ़ियों को पीने का पानी भी नसीब नहीं होगा, हम जितना समझ पा रहे हैं या उससे ज्यादा सुन पा रहे हैं स्तिथि उससे कई गुना भयानक है और इसमे शासन से ज्यादा दोषी प्रशासन हैं क्यो की योजना को धरातल पर लाने की जिम्मेदारी उन्ही की है और सबसे ज्यादा दोषी आम इंसान और उसका पर्यावरण के प्रति उदासीन रवैया है। एक आम इंसान जँगल नही लगा सकता लेकिन एक पेड़ तो लगा सकता है, आप के सामने कटते पेड़ो को तो रोक सकता है, नदियों को तो साफ कर सकता है? यदि कुछ नही कर सकते तो कम से कम उनके साथ तो खड़े हो सकते है जो आपके जीवन के लिए इस पर्यावरण को बचाने के लिए अपना सर्वस्व लगाकर लड़ रहे हैं। लेकिन जिस देश ने 'वसुदेव कुटुंकम्ब' का मतलब दुनिया को सिखाया उसी देश मे निरीह वन्य जीव, निसहाय जँगल रोज़ दम तोड़ रहे हैं लेकिन हमें अपनी छोटी छोटी सुख सुविधा और महत्वाकांक्षाओं से ज्यादा प्रेम है।

ये भी एक सोचने वाली बात है कि क्या हमारे देश में यूरोपीय देशों से भी ज्यादा विकास हो रहा है जिसके लिए नदियां, पर्वत, जँगल सब कुछ बर्बाद किया जा रहा है। यूरोपीय देशों में हमसे केहजार गुना ज्यादा विकास है लेकिन उन्होंने विकास को ही प्रकृति से सम्बन्धित करके जोड़ दिया है, स्विट्जरलैंड जैसे देशों की अर्थव्यवस्था ही वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता पर कायम है, ऐसे कई देश है जहाँ करोड़ो रोजगार मात्र पर्यटन से मिल रहे हैं, और वह आजीवन मिलते हैं, हमारे देश की सरकार ने ये कभी भी सीखने की कोशिश नही की जिन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करके विकास का ढोंग किया जा रहा है उन्हें सहेजकर भी करोड़ो रोजगार सदा के लिए उत्पन्न किये जा सकते हैं लेकिन उसके लिए ईमानदार इक्ष्शक्ति की आवश्यकता है जिसकी कमी शासन - प्रशासन और आमजन सभी मे विधमान है।

एक पेड़ को लगाते हुये सोशल मीडिया पर फ़ोटो डालने या शुभकामनाएं देने से पर्यावरण नही बचेगा क्योंकि पर्यावरण का कोई दिवस नही होता बल्कि जिस दिन पर्यावरण (जँगल-नदियां-पशु पक्षि) नही होगा समस्त धरती का ही कोई दिवस नही होगा।
अतः यदि हम सचमुच पर्यावरण दिवस मना रहे है तो तन-मन-धन से पर्यावरण के प्रति ईमानदार रहे।भले ही जीवन में एक पौधा लगाए लेकिन उसको वृक्ष बनते तक पोषित करे, नदियों की रक्षा करे,वन्य जीवों की रक्षा करे तभी पर्यावरण दिवस सार्थक होगा।

- करुणा रघुवंशी (पर्यावरणविद)
भोपाल, मध्यप्रदेश
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