जाने कहां गए वो दिन
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पोर पोर जब खिलते थे
बैठ मुंडेर कोयल रानी
हमसे बातें करती थीं
मीठी-मीठी बातें होती
मीठी मीठी होती रातें
कभी इधर को
कभी उधर को
फुदक फुदक कर चलती थी
मानव ने कैसा कर डाला
धुआ धुआ सा चारों और
है नहीं वह दिन राते अब
डाली डाली सुनी हो गई
पत्ता पत्ता रोता है
गौरैया की चहक नहीं न
कोयलिया की कूंक रही
अब तो जागो ऐ जग वालों
रोको सृष्टि का विनाश
घर आंगन में पेड़ लगाओ
जीवन अपना सफल बनाओ।
- कविता परिहार
नागपुर महाराष्ट्र
