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गजलों में श्रृंगार के साथ सामाजिक भाव भी है : डॉ. विनोद नायक


साहित्यिकी में गजलों ने किया भावविभोर 

दिलों के दाग़ जरा निगाहों से धोलो,
जरा सा मैं रोलूं जरा सा तुम रोलो,,

नागपुर। गजल पर दृष्टि डालें तो सर्वप्रथम हम सौंदर्य के रूप में ही जानते  हैं इसके शृंगारिक रूप से सभी परिचित हैं लेकिन गजल में चंचलता, चपलता, निर्मलता, निश्चलता व स्वच्छंदता है। सामाजिकता के भावों से निहित ग़ज़लें पूरे विश्व में फैल रहीं हैं। ग़ज़लों में श्रंगार के साथ सामाजिक भाव भी है उक्त कथन विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन साहित्यकी के संयोजक डॉ विनोद नायक ने बहारे गजल कार्यक्रम में व्यक्त किए। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता गुलाम मोहम्मद खान आलम ने की। अतिथि स्वागत संयोजक प्राध्यापक आदेश जैन ने किया। संचालन संयोजक डॉ विनोद नायक ने किया। उमर अली अनवर ने गजल प्रस्तुत कि- ज़बान पे शिकायत इधर भी है उधर भी है, दिल में मोहब्बत इधर भी है और उधर भी है। 

डॉ भोला सरवर ने गजल पेश कि- पैरों में बेडिंयां है मगर तोड़कर बढ़ो, इन सिरफिरी हवाओं का रूख मोड़कर बढो़। माधुरी राऊलकर ने गजल पेश कि- सब एक हद तक सहना तय रहता है, उसे जिंदगी कहना तय रहता है। हफीज शेख नागपुरी ने गजल पेश कि- किसी की आंखों में बरसात देख लेना,
बग़ैर छत के मकानात देख लेना। तन्हा नागपुरी ने गजल प्रस्तुत की दिलों के दाग़ जरा निगाहों से धोलो,,जरा सा मैं रो लूं जरा सा तुम रो लो। 

कार्यक्रम में भारती रावल, रमेश मौदेकर, कल्पना पिल्ले,डॉ राम माधव मुडे, तन्हा नागपुरी, शमशाद शाद, गुलाम मोहम्मद खान आलम, उमर अली अनवर, डॉ कृष्ण कुमार द्विवेदी, तेजिंदर सिंह, मजीद बैग मुगल, अमानी कुरेशी, माधुरी राऊलकर, शादाब अंजुम, हफीज शेख नागपुरी, हेमलता मिश्र मानवी, डॉ भोला सरवर, सुरेंद्र हरडे, निरुपमा चतुर्वेदी, ऊर्जा रजनी, डॉक्टर पवन कोरडे, शीला मिश्रा, प्रा आदेश जैन, समीर खान पठान, ह्रदय चक्रधर, मंजू कारमोरे और मानिक खोबरागड़े ने अपनी गजलों से भावविभोर कर दिया। आभार सहसंयोजिका  हेमलता मिश्र मानवी ने माना।
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