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ओम गुरू ओम


गुरू है ज्ञान की गुहार में, 
एकलव्य की आह में, 
कबीर की भोर में, 
अर्जुन की चाह में।। 

शबरी के बेर में, 
सुदामा के तंदुल में, 
मीरा के इनतजार में।। 

रहीम के दोहो में
सूर के पदों में
भक्त के  नमन में।। 

शरण की चाह में
भजनों के शब्दो में
शब्द शब्द के 
चाह चाह मे

अंतरमन की 
आह आह मे
ब्रह्मांड के सकल तत्व् में

गुरू तत्व मसी
गुरु ज्ञानमयी 
गुरु ओम मयी
ओम गुरू ओम।।

- रेखा तिवारी
14 मालवीय नगर, खामला
नागपुर
काव्य 7590425592205065766
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