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ढाई आखर प्रेम का...



प्रेम! है तो केवल ढाई अक्षरों का बहुत छोटा सा शब्द! पर अर्थ? गहरा है सागर सा, अनंत है आकाश सा,विस्तृत है वसुधा सा। इस ढाई अक्षर के शब्द में तो पूरी सृष्टी ही समाई है। जिसने इस शब्द के अर्थ को जीवन में जी लिया, समझ लीजिए उसने सब कुछ जीत लिया। ऐसा क्यों? 

कारण प्रेम वह उदात्त भाव है, भावना है जिसमें सब अपने लगने लगते हैं, मानव ही नहीं, सभी प्राणी संपूर्ण, प्रकृति! और सबके प्रति मानव मन में, जब 
'सर्वे सुखिन: संतु सर्वे संतु निरामया:,
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित दु:ख भाग्भवेत्।'
का भाव जग जाता हैतब वह सबका हो जाता है।सबका हो जाने का अर्थ ही है सबका प्रेम पाना। और इसके बाद फिर पाने को कुछ शेष रहता भी नहीं।
 
यह तो हुई प्रेम कीअत्यंत विषद, विस्तृत व्यापक  व्याख्या,जिसका वर्णन हमारे भक्ति कालीन कवियों, तुलसी, मीरा, सूर कबीर के साथ अनेक भक्त कवियों ने की है।

कबीर यदि कहते हैं, 'ढाई आखर प्रेम का पढ़ें सो पंडित होय' तब पंडित से उनका अर्थ उस व्यक्ति से है जो सबमें उस परमात्मा को ही देखता है। और जब दृष्टि इतनी व्यापक हो तब फिर सब प्रेममय हो जाता है। इसी तरह 'प्रेम गली अति सांकरी, वामें दोउ न समाय,' का भी यही अर्थ है अर्थात स्व को मिटाकर सर्व में समाहित हो जाना। मीरा ऐसी ही प्रेम दिवानी है, जित देखूं, तित्, श्याम। और राधा?
'अनुघन माधव, माधव सुमिरत, राधा भेलि मधाई।'

अर्थात श्याम रंग में डूबकर वह स्वयं श्याम हो जाती है। तात्पर्य यही है कि प्रेम एक अत्यंत उदात्त ,व्यापक भाव है। प्रेम त्याग है,प्रेम तपस्या है, प्रेम सेवा है, प्रेम समर्पण है, पूर्ण समर्पण। उसमें देने का भाव है। जब यह भाव ईश्वर के प्रति हो तो व्यक्ति का परलोक सुधरता है,और जब अपने से, अपनों से, संपूर्ण मानवता से हो तो उसका ईहलोक व परलोक दोनों ही सुधर जाता है ।
   
पर बडी़ कठिन डगर है प्रेम की। इसमें देना है, सहना है,कष्ट हैं,और परीक्षाएं भी हैं।जिन्होंने भी प्रेम के मार्ग को चुना,उस मार्ग पर चले उन्हें परीक्षाएं भी देनी पड़ीं हैं अपने प्रेम की। याद कीजिए मीरा का विषपान, उर्मिला का चौदह वर्ष का वियोग, सीता का वनवास और ऐसे न जाने कितने उदाहरण।

यह तो हुई प्रेम की अत्यंत व्यापक, गहरी व्याख्या किंतु आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जब हम विचार करते हैं तो लगता है,सच में क्या ढाई आखर प्रेम का पढ़कर व्यक्ति पंडित हो जाएगा? आज तो धारा विपरीत दिशा में बहती हुई सी दिखती है ।कबीर का अभिप्राय स्व से सर्व की ओर था किंतु आज हम सब स्व केंद्रित होते जा रहे हैं।

हम बंधे हैं स्व के घेरों में। मैं, मैंने, मेरा की संकुचित भावना ने हमें प्रेम रस की धार से वंचित कर दिया है। फिर वह प्रेम भाई भाई का हो, पति पत्नि का या अन्य कोई भी पारिवारिक रिश्ता। जिसने हमारी पारिवारिक सुख शांति छीन ली है। साथ रहकर भी हम कितने दूर होते जा रहे हैं एक दूसरे से। संबंधों में ये दरार, कटुता कहां ले जाएगी हमें?

प्रेम को लेकर यदि हम नई पीढी़ के नौजवानों की बात करें  तो दृश्य कुछ अलग ही नज़र आता है। प्रेम करना,नौजवान लड़के लड़कियों का, प्रेम का इज़हार करना बुरा भी नहीं। 

एक जमाना था जब इस पर पहरे बैठा दिए जाते थे। प्रेम का प्रदर्शन सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध माना जाता था।प्रेम करने वाले युगलों को कडे़ दंड, यहां तक कि मौत की सजा भी दी जाती रही है।

अब परिस्थितियां तेजी से बदली हैं।स्त्री स्वातंत्र्य, स्त्री शिक्षा, स्त्री की आत्मनिर्भरता, आदि ने नौजवानों को साथ रहने,  साथ शिक्षा के, नौकरी के अवसर दिए हैं। 

ऐसे में यदि वे एक दूसरे को जानने, समझने का प्रयास करते हैं, जो कि आजीवन साथ के लिए अनिवार्य भी है, तो इसमें क्या आपत्ती हो सकती है।किंतु वास्तव में ईमानदारी से आजीवन साथ रहने के लिए ही मिलने जुलने एक दूसरे को समझने के लिए ही ऐसा किया जा रहा हो।

किंतु हाल ही में हमने अपने देश में ही ऐसे न जाने कितने दु:खद, कितने दर्दनाक, व्यथित करने वाले उदाहरण देखें हैं कि आत्मा तड़प उठती है। प्रेम के नाम पर छल, प्रेम के नाम पर धोखा, और इतना ही नहीं टुकडें टुखड़े कर हत्या कर देना, अस्मिता लूटकर, फांसी चढा़ देना कौन सा रूप है प्रेम का?क्या इसे प्रेम कहा जाएगा?

वैलेंटाइन डे मनाने के नाम पर छिछोरापन, प्रेम का कृत्रिम प्रदर्शन,शारिरिक आकर्षण किस तरह से जीवन बर्बाद करते हैं इसके देश विदेशों में भी असंख्य उदाहरण देखने, सुनने को आए दिन मिलते रहते हैं ।

फ़रवरी का माह और इस माह का एक हफ्ता संसार में  प्रेम के प्रदर्शन को समर्पित है, विशेष रुप से चौदह फरवरी संत वैलेंटाइन डे के रुप में पूरे विश्व में मनाई जाती है, फरवरी व मार्च का माह है भी वसंत मनाने का। 

प्रेम के इज़हार का। प्रकृति खिल खिल जाती है, कोयल की कूक,भौंरों की गुंजन, फूलों की महक,सरसों की पीली पीली चमक स्वाभाविक रुप से आकर्षण उत्पन्न करती है मन में, है ही वसंत ऋतुराज। प्रकृति भी इज़हार करती है प्रेम का।वास्तविक जीवन में भी प्रेम के सही रूप को जानने, समझने व तदनुरूप व्यवहार में उतारने की, ढाई आखर के प्रेम का वास्तविक अर्थ समझने  की अत्यंत आवश्यकता है ।

- प्रभा मेहता 
नागपुर, महाराष्ट्र 
समाचार 5887517147783596394
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