मानवीय भावनाओं का सबसे दुर्लभ चरण : महाकुंभ बनाम वैलेंटाइन डे!
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यह एक ऐसा महीना रहा है, जब हमारा गौरवशाली देश पवित्र शहर प्रयागराज उत्तर प्रदेश में चल रहे महाकुंभ के पवित्र संगम में स्नान करने वाले लाखों लोगों के माध्यम से हमारी आस्था और धर्म के प्रति प्रेम का साक्षी बन रहा है। यह एक ऐसा प्रेम है जो भक्ति के रूप में प्रकट हुआ है जहां भक्तों में इस महाकुंभ पर्व के प्रति अपार श्रद्धा है, वे किसी भी प्रतिकूलता की परवाह नहीं कर रहे और न ही अपनी आस्था को विचलित होने देते। वे अपने मन में किसी भी नकारात्मकता को कोई स्थान नहीं देना चाहते, और किसी भी कीमत पर इस सुनहरे अवसर को खोना नहीं चाहते। अब इसी दरमियान महाकुंभ के बीच अंतर्राष्ट्रीय प्रेम उत्सव यानी वैलेंटाइन डे भी आ गया है और उसका असर भी सब तरफ दिख रहा है पर कुम्भ के आगे उसका क्रेज भी कम ही है वो इस बात से साबित होता है जिसे मैं एक बेहद आश्चर्यजनक भक्ति में से एक माना जा सकता है कि कुछ प्रेमी जोड़े और विवाहित जोड़े अपने साथी को कुंभ में अपने पवित्र बंधन को भक्तिपूर्ण तरीके से मनाने के लिए ले जा रहे हैं, आखिरकार यह अवसर हर साल नहीं आएगा, इसलिए उन्होंने इस रोमांटिक प्रेम को आस्था और धर्म के साथ मिला दिया है।
अब दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं जो अपने कम्फर्ट में घर पर रहना और अपने सामान्य जीवन की गतिविधियाँ या कर्तव्यों के निर्वहन में ही खुश हैं। उन्हें प्रयागराज में पवित्र स्नान का कोई पछतावा नहीं है। वे अपने काम के उपासक हैं, वे बाहरी पूजा, मूर्ति पूजा और तीर्थयात्रा की आलोचना भी नहीं करते हैं, अपितु बस अपने तरीके से साधारण जिंदगी जीने का आनंद लेते हैं। इसलिए यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि प्रेम, विश्वास, भक्ति ये सब गहरी भावनाएँ हैं और बहुत ही व्यक्तिगत हैं। ये भावनाएँ कई अलग- अलग तरीकों से अनुभूत हो सकती हैं, और यह कैसा महसूस होता है और कैसा लगता है, प्रत्येक व्यक्ति और उनके अनुभवों के लिए अद्वितीय हो सकता है। कुछ लोगों के लिए, प्रेम एक रोमांटिक साझेदारी हो सकती है, और आस्था पूरे साल कई उपवास और विस्तृत अनुष्ठानों का पालन करना हो सकता है, जबकि अन्य लोगों के लिए, प्रेम, परिवार के सदस्यों, दोस्तों के बीच का बंधन हो सकता है, या यहाँ तक कि खुद के साथ एक गहरा संबंध भी हो सकता है और आस्था दैनिक जीवन में कृतज्ञता की भावपूर्ण प्रार्थनाओं के साथ जीना हो सकता है।
इसलिए, यह स्पष्ट प्यार के इस मौसम में, भारत धार्मिक आस्था में डूबा हुआ है और रोमांटिक प्रेम उतना चलन में नहीं है जितना पिछले वर्षों में हुआ करता था। लाखों लोग धार्मिक आस्था के प्रति प्रेम में खुद पर काबू नहीं रख पा रहे हैं, भले ही देश में एक दिल दहला देने वाली भगदड़ ने हजारों लोगों की जान ले ली हो, पवित्र शहर के स्थानीय लोग भारी भीड़ और अत्यधिक ट्रैफिक जाम के कारण बहुत दर्द और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, फिर भी किसी को कोई डर नहीं है और कोई भी परवाह नहीं। इसे जुनून कहा जा सकता है जब सभी विद्वानों, विशेषज्ञों की समीक्षा और सलाह विफल हो जाती है और अधिकांश लोग केवल एक ही विषय पर ध्यान केंद्रित करते हैं और अपनी अंतरात्मा की गहरी भावना को फालो करना पसंद कर रहे हैं। यह मानवीय भावनाओं का सबसे दुर्लभ चरण है, ठीक इस अनोखे महाकुंभ की तरह। तो आइए हम इस दुर्लभ चरण से जितना हो सकें सीखें, धैर्य बनाए रखें, क्योंकि शासन व्यवस्था के आगे हमारी कुछ चलने वाली नहीं है और असीम आस्था के आगे कोई भी प्रवचन निरर्थक है। चाहे वह भावनात्मक प्रेम हो, रोमांटिक प्रेम हो, आत्म- प्रेम हो, प्लेटोनिक प्रेम हो, आत्मीय भक्ति हो या सतही पूजा हो। आखिरकार, प्रेम, विश्वास और भक्ति जटिल और बहुआयामी भावनाएँ हैं जिन्हें अनगिनत तरीकों से अनुभव किया जा सकता है।
- शशि दीप
द्विभाषी लेखक/पत्रकार मुंबई
